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Awakening

उद्धयमेव भैरवी

Strategic Mind Game

War always has Economic and Political ramifications apart from a huge loss of Human Lives. The CPC (Communist Party of China) understands that any agression with India right now can seriously threaten its Economy which is larger than India ofcourse but it certainly has slowed down considerably and only looks good because of fudged numbers.

Now lets see how Political ramifications will affect the CPC. I always say that there is a Politics of Economics and Economics of Politics. China is built on Blood and Resentment. Hence there are many pro democracy hawks who would explore and exploit any opportunity to bring down the ruling CPC or atleast damage it.

Moreover there are many internal problems that China harbors and Islamic extremism is also one of them. Beijing knows that it made a huge mistake by letting India play with the US that Beijing considers a bigger threat than India. Not to forget that China is in land/sea dispute with another 2 dozen countries and hence India becomes an obvious choice for most of these countries affected by the dragons Expansionist ambitions.

PLA knows that any agression along the Border will seriously Jeopardize its million dollar baby CPEC and halt its OBOR ambitions forever. Hence it becomes imperative for China to work with India as it faces a serious threat of being declared a global Pariah especially because of its collusion with the Mothership of Terrorism called Pakistan and a Schizophrenic North Korea.

A conflict with India will give an opportunity for the western countries to manipulate China’s internal mess and this the dragon knows will hurt them where it matters the most.

Hence the only get out option for Beijing is New Delhi and they very well know that being at loggerheads with India in the current scenario will prove to be counter productive to their long time strategic interest. Now the all important question is that then why China is trying to change the status quo at the Tri-Junction and back it up venomously ???

Only 2 possible reasons that I can think of. 
1) To deflect attention of its people from economics and internal mess towards National Interest.

2) To check if Our relentless proactive diplomatic efforts around the globe has paid off or not.

As per my assertion both have backfired. The average Chinese are no longer interested in such border disputes as China keeps having one every other day but only the neighbors keep changing and with the dok la standoff they assumed that India would panic and run around knocking Doors of Global Powers to come to its rescue but baffling the Dragon we stood our Ground in Dok la and to further rattle Beijing we announced that we are ready for a War in a 2 and a Half front scenario.

Ravi Pardeshi

रक्त रंजित इतिहास राम मंदिर का

जब बाबर दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुआ उस समय जन्मभूमि सिद्ध महात्मा श्यामनन्द जी महाराज के अधिकार क्षेत्र में थी । महात्मा श्यामनन्द की ख्याति सुनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा आशिकान अयोध्या आये । महात्मा जी के शिष्य बनकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा ने योग और सिद्धियाँ प्राप्त कर ली और उनका नाम भी महात्मा श्यामनन्द के ख्यातिप्राप्त शिष्यों में लिया जाने लगा ।
यह सुनकर जलालशाह नाम का एक फकीर भी महात्मा श्यामनन्द के पास आया और उनका शिष्य बनकर सिद्धियाँ प्राप्त करने लगा । जलालशाह एक कट्टर मुसलमान था, और उसको एक ही सनक थी, हर जगह इस्लाम का आधिपत्य स्थापित करना । अत: जलालशाह ने अपने काफिर गुरू की पीठ में छुरा घोंपकर ख्वाजा कजल अब्बास मूसा के साथ मिलकर यह विचार किया की यदि इस मदिर को तोड़ कर मस्जिद बनवा दी जाये तो इस्लाम का परचम हिन्दुस्थान में स्थायी हो जायेगा । धीरे धीरे जलालशाह और ख्वाजा कजल अब्बास मूसा इस साजिश को अंजाम देने की तैयारियों में जुट गए ।

सर्वप्रथम जलालशाह और ख्वाजा बाबर के विश्वासपात्र बने और दोनों ने अयोध्या को खुर्द मक्का बनाने के लिए जन्मभूमि के आसपास की जमीनों में बलपूर्वक मृत मुसलमानों को दफन करना शुरू कििया और मीरबाँकी खां के माध्यम से बाबर को उकसाकर मंदिर के विध्वंस का कार्यक्रम बनाया । बाबा श्यामनन्द जी अपने मुस्लिम शिष्यों की करतूत देख के बहुत दुखी हुए और अपने निर्णय पर उन्हें बहुत पछतावा हुआ ।

दुखी मन से बाबा श्यामनन्द जी ने रामलला की मूर्तियाँ सरयू में प्रवाहित कर दी और हिमालय तपसया करने चले गए । मंदिर के पुजारियों ने मंदिर के अन्य सामान आदि हटा लिए और वे स्वयं मंदिर के द्वार पर रामलला की रक्षा के लिए खड़े हो गए । जलालशाह की आज्ञा के अनुसार उन चारो पुजारियों के सर काट लिए गए । जिस समय मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने की घोषणा हुई उस समय भीटी के राजा महताब सिंह बद्री नारायण की यात्रा करने के लिए निकले थे । अयोध्या पहुचने पर रास्ते में उन्हें यह समाचार मिली तो उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी और अपनी छोटी सेना को लेकर रामभक्तों को शामिल कर १ लाख चौहत्तर हजार लोगो के साथ बाबर की सेना के ४ लाख ५० हजार सैनिकों से लोहा लेने निकल पड़े ।

रामभक्तों ने सौगंध ले रक्खी थी रक्त की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे । जब तक प्राण है तब तक मंदिर नहीं गिरने देंगे

रामभक्त वीरता के साथ लड़े । ७० दिनों तक घोर संग्राम होता रहा और अंत में राजा महताब सिंह समेत सभी १ लाख ७४ हजार रामभक्त मारे गए । श्रीराम जन्मभूमि रामभक्तों के रक्त से लाल हो गयी। इस भीषण नर सहंर के बाद मीरबांकी ने तोप लगा के मंदिर गिरवा दिया । मंदिर के मसाले से ही मस्जिद का निर्माण हुआ । पानी की जगह मरे हुए हिन्दुओं का रक्त प्रयोग किया गया नीव में लखौरी इंटों के साथ ।

इतिहासकार कनिंघम अपने लखनऊ गजेटियर के 66वें अंक के पृष्ठ 3 पर लिखते है की एक लाख चौहतर हजार हिंदुओं की लाशें गिर जाने के पश्चात मीरबाँकी अपने मंदिर ध्वस्त करने के अभियान मे सफल हुआ और उसके बाद जन्मभूमि के चारो और तोप लगवाकर मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया ।

इसी प्रकार हैमिल्टन नाम का एक अंग्रेज बाराबंकी गजेटियर में लिखता है की “जलालशाह ने हिन्दुओं के खून का गारा बना के लखौरी ईटों की नीव मस्जिद बनवाने के लिए दी गयी थी ।”

उस समय अयोध्या से ६ मील की दूरी पर सनेथू नाम का एक गाँव के पंडित देवीदीन पाण्डेय ने वहां के आस पास के गांवों सराय सिसिंडा राजेपुर आदि के सूर्यवंशीय क्षत्रियों को एकत्रित किया । देवीदीन पाण्डेय ने सूर्यवंशीय क्षत्रियों से कहा भाइयों आप लोग मुझे अपना राजपुरोहित मानते हैं । आप के पूर्वज श्री राम थे और हमारे पूर्वज महर्षि भरद्वाज जी । आज मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्मभूमि को मुसलमान आक्रान्ता कब्रों से पाट रहे हैं और खोद रहे हैं । इस परिस्थिति में हमारा मूकदर्शक बन कर जीवित रहने की बजाय जन्मभूमि की रक्षार्थ युद्ध करते करते वीरगति पाना ज्यादा उत्तम होगा ।

देवीदीन पाण्डेय की आज्ञा से दो दिन के भीतर ९० हजार क्षत्रिय इकठ्ठा हो गए दूर दूर के गांवों से लोग समूहों में इकठ्ठा हो कर देवीदीन पाण्डेय के नेतृत्व में जन्मभूमि पर जबरदस्त धावा बोल दिया । शाही सेना से लगातार ५ दिनों तक युद्ध हुआ । छठे दिन मीरबाँकी का सामना देवीदीन पाण्डेय से हुआ उसी समय धोखे से उसके अंगरक्षक ने एक लखौरी ईंट से पाण्डेय जी की खोपड़ी पर वार कर दिया । देवीदीन पाण्डेय का सर बुरी तरह फट गया मगर उस वीर ने अपने पगड़ी से खोपड़ी से बाँधा और तलवार से उस कायर अंगरक्षक का सर काट दिया । इसी बीच मीरबाँकी ने छिपकर गोली चलायी जो पहले ही से घायल देवीदीन पाण्डेय जी को लगी और वो जन्मभूमि की रक्षा में वीर गति को प्राप्त हुए । जन्मभूमि फिर से 90 हजार हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी । देवीदीन पाण्डेय के वंशज सनेथू ग्राम के ईश्वरी पांडे का पुरवा नामक जगह पर अब भी मौजूद हैं । पाण्डेय जी की मृत्यु के १५ दिन बाद हंसवर के महाराज रणविजय सिंह ने सिर्फ २५ हजार सैनिकों के साथ मीरबाँकी की विशाल और शस्त्रों से सुसज्जित सेना से रामलला को मुक्त कराने के लिए आक्रमण किया । 10 दिन तक युद्ध चला और महाराज जन्मभूमि के रक्षार्थ वीरगति को प्राप्त हो गए । जन्मभूमि में 25 हजार हिन्दुओं का रक्त फिर बहा । रानी जयराज कुमारी हंसवरके स्वर्गीय महाराज रणविजय सिंह की पत्नी थी ।

जन्मभूमि की रक्षा में महाराज के वीरगति प्राप्त करने के बाद महारानी ने उनके कार्य को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया और तीन हजार नारियों की सेना लेकर उन्होंने जन्मभूमि पर हमला बोल दिया और हुमायूं के समय तक उन्होंने छापामार युद्ध जारी रखा। रानी के गुरु स्वामी महेश्वरानंद जी ने रामभक्तों को इकठ्ठा करके सेना का प्रबंध करके जयराज कुमारी की सहायता की । साथ ही स्वामी महेश्वरानंद जी नेसन्यासियों की सेना बनायीं इसमें उन्होंने २४ हजार सन्यासियों को इकठ्ठा किया और रानी जयराज कुमारी के साथ, हुमायूँ के समय में कुल १० हमले जन्मभूमि के उद्धार के लिए किये । १०वें हमले में शाही सेना को काफी नुकसान हुआ और जन्मभूमि पर रानी जयराज कुमारी का अधिकार हो गया ।

लेकिन लगभग एक महीने बाद हुमायूँ ने पूरी ताकत से शाही सेना फिर भेजी, इस युद्ध में स्वामी महेश्वरानंद और रानी कुमारी जयराज कुमारी लड़ते हुए अपनी बची हुई सेना के साथ मारे गए और जन्मभूमि पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया । श्रीराम जन्मभूमि एक बार फिर कुल 24 हजार सन्यासियों और 3 हजार वीर नारियों के रक्त से लाल हो गयी ।

रानी जयराज कुमारी और स्वामी महेश्वरानंद जी के बाद यद्ध का नेतृत्व स्वामी बलरामचारी जी ने अपने हाथ में ले लिया । स्वामी बलरामचारी जी ने गांव-गांव में घूम कर रामभक्त हिन्दू युवकों और सन्यासियों की एक मजबूत सेना तैयार करने का प्रयास किया और जन्मभूमि के उद्धारार्थ २० बार आक्रमण किये । इन २० हमलों में काम से काम १५ बार स्वामी बलरामचारी ने जन्मभूमि पर अपना अधिकार कर लिया मगर यह अधिकार अल्प समय के लिए रहता था । थोड़े दिन बाद बड़ी शाही फ़ौज आती थी और जन्मभूमि पुनः मुगलों के अधीन हो जाती थी । जन्मभूमि में लाखों हिन्दू बलिदान होते रहे । उस समय का मुग़ल शासक अकबर था ।

शाही सेना हर दिन के इन युद्धों से कमजोर हो रही थी । अतः अकबर ने बीरबल और टोडरमल के कहने पर खस की टाट से उस चबूतरे पर ३ फीट का एक छोटा सा मंदिर बनवा दिया । लगातार युद्ध करते रहने के कारण स्वामी बलरामचारी का स्वास्थ्य गिरता चला गया था और प्रयाग कुम्भ के अवसर पर त्रिवेणी तट पर स्वामी बलरामचारी की मृत्यु हो गयी ।

इस प्रकार बार-बार के आक्रमणों और हिन्दू जनमानस के रोष एवं हिन्दुस्थान पर मुगलों की ढीली होती पकड़ से बचने का एक राजनैतिक प्रयास की अकबर की इस कूटनीति से कुछ दिनों के लिए जन्मभूमि में रक्त नहीं बहा ।

यही क्रम शाहजहाँ के समय भी चलता रहा । फिर औरंगजेब के हाथ सत्ता आई । वो कट्टर मुसलमान था और उसने समस्त भारत से काफिरों के सम्पूर्ण सफाये का संकल्प लिया था । उसने लगभग 10 बार अयोध्या मे मंदिरों को तोड़ने का अभियान चलकर यहाँ के सभी प्रमुख मंदिरों की मूर्तियों को तोड़ डाला ।

औरंगजेब के समय में समर्थ गुरु श्री रामदास जी महाराज जी के शिष्य श्री वैष्णवदास जी ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ 30 बार आक्रमण किये । इन आक्रमणों मे अयोध्या के आस पास के गांवों के सूर्यवंशीय क्षत्रियों ने पूर्ण सहयोग दिया जिनमे सराय के ठाकुर सरदार गजराज सिंह और राजेपुर के कुँवर गोपाल सिंह तथा सिसिण्डा के ठाकुर जगदंबा सिंह प्रमुख थे । यह सारे वीर यह जानते हुए भी की उनकी सेना और हथियार बादशाही सेना के सामने कुछ भी नहीं है, अपने जीवन के आखिरी समय तक शाही सेना से लोहा लेते रहे । लम्बे समय तक चले इन युद्धों में रामलला को मुक्त कराने के लिए हजारों हिन्दू वीरों ने अपना बलिदान दिया और अयोध्या की धरती पर उनका रक्त बहता रहा ।

ठाकुर गजराज सिंह और उनके साथी क्षत्रियों के वंशज आज भी सराय मे मौजूद हैं । आज भी फैजाबाद जिले के आस पास के सूर्यवंशीय क्षत्रिय सिर पर पगड़ी नहीं बांधते, जूता नहीं पहनते, छता नहीं लगाते, उन्होने अपने पूर्वजों के सामने ये प्रतिज्ञा ली थी की जब तक श्री राम जन्मभूमि का उद्धार नहीं कर लेंगे तब तक जूता नहीं पहनेंगे, छाता नहीं लगाएंगे, पगड़ी नहीं पहनेंगे । 1640 ईस्वी में औरंगजेब ने मन्दिर को ध्वस्त करने के लिए जबांज खाँ के नेतृत्व में एक जबरजस्त सेना भेज दी थी । बाबा वैष्णव दास के साथ साधुओं की एक सेना थी जो हर विद्या मे निपुण थी इसे चिमटाधारी साधुओं की सेना भी कहते थे । जब जन्मभूमि पर जबांज खाँ ने आक्रमण किया तो हिंदुओं के साथ चिमटाधारी साधुओं की सेना मिल गयी और उर्वशी कुंड नामक जगह पर जाबाज़ खाँ की सेना से सात दिनों तक भीषण युद्ध किया ।

चिमटाधारी साधुओं के चिमटे के मार से मुगलों की सेना भाग खड़ी हुई । इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मंदिर की रक्षा हो गयी । जाबाज़ खाँ की पराजित सेना को देखकर औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ और उसने जाबाज़ खाँ को हटाकर एक अन्य सिपहसालार सैय्यद हसन अली को 50 हजार सैनिकों की सेना और तोपखाने के साथ अयोध्या की ओर भेजा और साथ मे यह आदेश दिया की अबकी बार जन्मभूमि को बर्बाद करके वापस आना है । यह समय सन्  1680 का था । बाबा वैष्णव दास ने सिक्खों के गुरु गुरुगोविंद सिंह से युद्ध मे सहयोग के लिए पत्र के माध्यम संदेश भेजा । पत्र पाकर गुरु गुरुगोविंद सिंह सेना समेत तत्काल अयोध्या आ गए और ब्रहमकुंड पर अपना डेरा डाला । ब्रहमकुंड वही जगह जहां आजकल गुरुगोविंद सिंह की स्मृति मे सिक्खों का गुरुद्वारा बना हुआ है । बाबा वैष्णव दास एवं सिक्खों के गुरुगोविंद सिंह रामलला की रक्षा हेतु एकसाथ रणभूमि में कूद पड़े । इन वीरों कें सुनियोजित हमलों से मुगलो की सेना के पाँव उखड़ गये । सैय्यद हसन अली भी युद्ध मे मारा गया । औरंगजेब हिंदुओं की इस प्रतिक्रिया से स्तब्ध रह गया था और इस युद्ध के बाद 4 साल तक उसने अयोध्या पर हमला करने की हिम्मत नहीं की । औरंगजेब ने सन् 1664 मे एक बार फिर श्री राम जन्मभूमि पर आक्रमण किया । इस भीषण हमले में शाही फौज ने लगभग 10 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या कर दी । नागरिकों तक को नहीं छोड़ा । जन्मभूमि हिन्दुओं के रक्त से लाल हो गयी । जन्मभूमि के अंदर नवकोण के एक कंदर्प कूप नाम का कुआं था । सभी मारे गए हिंदुओं की लाशें को मुगलों ने उसमे फेककर चारों ओर चहारदीवारी उठा कर उसे घेर दिया ।

आज भी कंदर्पकूप “गज शहीदा” के नाम से प्रसिद्ध है और जन्मभूमि के पूर्वी द्वार पर स्थित है । शाही सेना ने जन्मभूमि का चबूतरा खोद डाला । बहुत दिनो तक वह चबूतरा गड्ढे के रूप मे वहाँ स्थित था । औरंगजेब के क्रूर अत्याचारो की मारी हिन्दू जनता अब उस गड्ढे पर ही श्री रामनवमी के दिन भक्तिभाव से अक्षत, पुष्प और जल चढाती रहती थी । नबाब सहादत अली के समय 1763 ईस्वी में जन्मभूमि के रक्षार्थ अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह और पिपरपुर के राजकुमार सिंह के नेतृत्व मे बाबरी ढांचे पर पुनः पाँच आक्रमण किये गये जिसमें हर बार हिन्दुओं की लाशें अयोध्या में गिरती रहीं । लखनऊ गजेटियर मे कर्नल हंट लिखता है की “लगातार हिंदुओं के हमले से ऊबकर नबाब ने हिंदुओं और मुसलमानो को एक साथ नमाज पढ़ने और भजन करने की इजाजत दे दी पर सच्चा मुसलमान होने के नाते उसने काफिरों को जमीन नहीं सौंपी ।”

“लखनऊ गजेटियर पृष्ठ 62” नासिरुद्दीन हैदर के समय मे मकरही के राजा के नेतृत्व में जन्मभूमि को पुनः अपने रूप मे लाने के लिए हिंदुओं के तीन आक्रमण हुये जिसमें बड़ी संख्या में हिन्दू मारे गये । परन्तु तीसरे आक्रमण में डटकर नबाबी सेना का सामना हुआ । 8वें दिन हिंदुओं की शक्ति क्षीण होने लगी, जन्मभूमि के मैदान मे हिन्दुओं और मुसलमानो की लाशों का ढेर लग गया । इस संग्राम मे भीती, हंसवर, मकर ही, खजुरहट, दीयरा अमेठी के राजा गुरुदत्त सिंह आदि सम्मलित थे । हारती हुई हिन्दू सेना के साथ वीर चिमटाधारी साधुओं की सेना आ मिली और इस युद्ध मे शाही सेना के चिथड़े उड गये और उसे रौंदते हुए हिंदुओं ने जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया ।

मगर हर बार की तरह कुछ दिनो के बाद विशाल शाही सेना ने पुनः जन्मभूमि पर अधिकार कर लिया और हजारों हिन्दुओं को मार डाला गया । जन्मभूमि में हिन्दुओं का रक्त प्रवाहित होने लगा । नावाब वाजिदअली शाह के समय मे पुनः हिंदुओं ने जन्मभूमि के उद्धारार्थ आक्रमण किया । फैजाबाद गजेटियर में कनिंघम ने लिखा “इस संग्राम मे बहुत ही भयंकर खूनखराबा हुआ । दो दिन और रात होने वाले इस भयंकर युद्ध में सैकड़ों हिन्दुओं के मारे जाने के बावजूद हिन्दुओं नें राम जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया । क्रुद्ध हिंदुओं की भीड़ ने कब्रें तोड़ फोड़ कर बर्बाद कर डाली । मस्जिदों को मिसमार करने लगे और पूरी ताकत से मुसलमानों को मार-मार कर अयोध्या से खदेड़ना शुरू किया । मगर हिन्दू भीड़ ने मुसलमान स्त्रियों और बच्चों को कोई हानि नहीं पहुचाई । अयोध्या मे प्रलय मचा हुआ था ।”

इतिहासकार कनिंघम लिखता है की यह अयोध्या का सबसे बड़ा हिन्दू मुस्लिम बलवा था । हिंदुओं ने अपना सपना पूरा किया और औरंगज़ेब द्वारा विध्वंस किए गए चबूतरे को फिर वापस बनाया । चबूतरे पर तीन फीट ऊँची खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनवा लिया जिसमे पुनः रामलला की स्थापना की गयी ।

कुछ जेहादी मुल्लाओं को ये बात स्वीकार नहीं हुई और कालांतर में जन्मभूमि फिर हिन्दुओं के हाथों से निकल गयी । सन 1857 की क्रांति मे बहादुर शाह जफर के समय में बाबा रामचरण दास ने एक मौलवी आमिर अली के साथ जन्मभूमि के उद्धार का प्रयास किया पर 18 मार्च सन 1858 को कुबेर टीला स्थित एक इमली के पेड़ मे दोनों को एक साथ अंग्रेज़ो ने फांसी पर लटका दिया ।

जब अंग्रेज़ो ने ये देखा कि ये पेड़ भी देशभक्तों एवं रामभक्तों के लिए एक स्मारक के रूप मे विकसित हो रहा है तब उन्होने इस पेड़ को कटवा कर इस आखिरी निशानी को भी मिटा दिया । इस प्रकार अंग्रेज़ो की कुटिल नीति के कारण रामजन्मभूमि के उद्धार का यह एकमात्र प्रयास विफल हो गया ।

अन्तिम बलिदान

३० अक्टूबर १९९० को हजारों रामभक्तों ने वोट-बैंक के लालची मुलायम सिंह यादव के द्वारा खड़ी की गईं अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया । लेकिन २ नवम्बर १९९० को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें सैकड़ों रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दीं । सरकार ने मृतकों की असली संख्या छिपायी परन्तु प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सरयू तट रामभक्तों की लाशों से पट गया था । ४ अप्रैल १९९१ को कार सेवकों के हत्यारे, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दिया । लाखों राम भक्त ६ दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वार बनाए गए अपमान के प्रतीक मस्जिद नुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया । परन्तु हिन्दू समाज के अन्दर व्याप्त घोर संगठन हीनता एवं नपुंसकता के कारण आज भी हिन्दुओं के सबसे बड़े आराध्य भगवान श्रीराम एक फटे हुए तम्बू में विराजमान हैं । जिस जन्मभूमि के उद्धार के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना रक्त पानी की तरह बहाया, आज वही हिन्दू बेशर्मी से इसे “एक विवादित स्थल” कहता है ।
सदियों से हिन्दुओं के साथ रहने वाले मुसलमानों ने आज भी जन्मभूमि पर अपना दावा नहीं छोड़ा है । वो यहाँ किसी भी हाल में मन्दिर नहीं बनने देना चाहते हैं ताकि हिन्दू हमेशा कुढ़ता रहे और उन्हें नीचा दिखाया जा सके ।

जिस कौम ने अपने ही भाईयों की भावना को नहीं समझा वो सोचते हैं हिन्दू उनकी भावनाओं को समझे । आज तक किसी भी मुस्लिम संगठन ने जन्मभूमि के उद्धार के लिए आवाज नहीं उठायी, प्रदर्शन नहीं किया और सरकार पर दबाव नहीं बनाया । आज भी वे बाबरी-विध्वंस की तारीख 6 दिसम्बर को काला दिन मानते हैं । और मूर्ख हिन्दू समझता है कि राम जन्मभूमि राजनीतिज्ञों और मुकदमों के कारण उलझा हुआ है ।
यह लेख पढ़कर जिन हिन्दुओं को शर्म नहीं आयी वो कृपया अपने घरों में राम का नाम ना लें । अपने रिश्तेदारों से कह दें कि उनके मरने के बाद कोई “राम नाम” का नारा भी नहीं लगाएं । विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता एक दिन श्रीराम जन्मभूमि का उद्धार कर वहाँ मन्दिर अवश्य बनाएंगे । चाहे अभी और कितना ही बलिदान क्यों ना देना पड़ेगा ।

क्रप्या आगे फॉरवर्ड करे । आपका बहुत आभारी रहूँगा ।

India & China – Anathema Interesting Stand Off

By Prashant Singh

So I ask once again…

Who all are willing to enlist ?

Because this is turning out to be the showdown of the century.

Why am I talking about this? Read on…

1. India ergo Modi ji becomes the first country / leader to actually stand up to the Chinese.

2. Yes…the rest of the so called global leaders have done nothing but lean in their seats and fart away uncomfortably whenever the Chinese fed them rotten GOAT cheese.

3. India as usual is on the right side of this conflict but thankfully for the FIRST time has brought it’s dusty balls to the front at DOKLAM.

4. Neither India nor China can back away from this confrontation without losing “face” – a die for cultural necessity for the Chinese.

5. The one who backs down from this will DIMINISH and FADE AWAY both in the global and economic space

6. More so a desperate reason for China to “beat back” India and ensure it sends a strong message to us so that we don’t ever dream of such adventures with it…that’s the thinking that’s thundering across the Chinese leadership and politburo.

7. Expect Ajit Doval to be dispatched to Beijing to try and find a middle ground…which in itself will be both an acknowledgement of India’s weak spine and worse a chance for the Chinese to exploit and declare to the world that the Indian might is nothing but a hype.

8. I am curious to see how the present government is going to handle this wrinkle in their decision to reach out to the CHINCHINS.

9. For any withdrawal of a legally valid deployment of troops by India will forever finish any dreams of it expecting to walk the corridors of global power.

10. Worse any dilly dallying by India in rushing in more troops and armaments in to the region would only ensure an even more humiliating rout of the handful of soldiers and units standing guard on the plateau.

11. China will use this as an excuse to put to test it’s newer divisions and strategies and what better time to do it than the IMMEDIATE when the Indians are still sleeping and scratching their balls…

12. A BLITZKRIEG of an operation that shocks and pushes back the Indian troops followed by a self declared ceasefire would clearly stump both the Indians and the world in to silence.

So to conclude the time for the testing of 56 is actually now.

Both of the PM as well as of my countrymen.

Interesting times indeed…just as I have been forecasting …

ना जिन्ना सेक्यूलर थे, ना पाकिस्तान का पाकिस्तान का निर्माण आकस्मिक था

कुछ झूठ ऐसे होते हैं, जो लम्बे समय तक सच मान लिए जाते हैं. इन्हीं में से एक झूठ यह है कि मोहम्मद अली जिन्ना “सेक्यूलर” थे और 1947 से पहले गांधी-नेहरू के साथ हुए सत्ता एवं शक्ति संघर्ष की राजनीति में हारने के कारण जिन्ना ने पाकिस्तान के निर्माण का दाँव चला. लेकिन यह सच नहीं है, “पाकिस्तान” नामक इस्लामिक शरिया देश की कल्पना 1947 से बहुत-बहुत पहले अर्थात 1937 में ही रखी जा चुकी थी ।

विभाजन को लेकर इस समय भारत में तीन विचार हैं । पहला विचार यह है कि गाँधी-नेहरू ने अपनी जिद और सत्ता-प्रेम के कारण भारत के टुकड़े होने दिए । दूसरा विचार यह है कि जिन्ना को इतना उपेक्षित और आहत कर दिया गया था कि उन्होंने अपने अहंकार में आकर, एक इस्लामिक देश यानी पाकिस्तान बनाने की जिद पकड़ ली जबकि तीसरा विचार यह है कि हिन्दू महासभा तथा सावरकर जैसे कट्टर हिन्दू नेताओं के (जो कि मुस्लिमों को भारत से खदेड़ना चाहते थे) रुख के कारण पाकिस्तान का निर्माण हुआ ।

उपरोक्त तीनों विचारों में से पहला विचार काफी हद तक सही माना जाता है, जबकि दूसरा विचार एकदम झूठा और मुस्लिमों तथा जिन्ना की वास्तविक नीयत और छवि छिपाने के लिए किया गया “एजेंडात्मक दुष्प्रचार” है जबकि सावरकर संबंधी तीसरा विचार बढ़चढ़कर पेश किया गया है क्योंकि उन दिनों हिन्दू महासभा अथवा सावरकर कभी भी इतने शक्तिशाली नहीं थे कि वे देश में “हिन्दू शासन” स्थापित कर पाते या मुस्लिमों को भारत से निकाल पाते । असल में प्रस्तुत लेख उस दूसरे विचार (अर्थात जिन्ना को गाँधी-नेहरू ने अपमानित और उपेक्षित किया इसलिए पाकिस्तान बना) की धज्जियाँ उड़ाने के लिए तथ्य प्रस्तुत करता है । उस समय भी और आज भी वास्तविकता यह है कि मुस्लिमों को हमेशा एक ऐसा “देश” चाहिए होता है, जहाँ वे सदैव बहुमत में रहें । मुस्लिम कभी भी, कहीं भी अल्पसंख्यक नहीं रहना चाहता, वह केवल शरीयत आधारित इस्लामिक राष्ट्र चाहता है । सुनने में शायद यह अतिवादी लगे, परन्तु सच यही है और इसी सच का पूरा तथ्यानुसार एवं विवरणात्मक विश्लेषण पेश किया है लेखक वेंकट धुलिपाला ने अपनी नई अंगरेजी पुस्तक “क्रिएटिंग अ न्यू मदीना” (Creating a New Medina… कैम्ब्रिज विवि प्रेस, पृष्ठ 530) में ।

असल में “इस्लाम के मूलभूत विचारों से अनजान” लोग मोहम्मद अली जिन्ना को टाई-सूट पहनने वाला, सिगार और चुरुट पीने वाला, सूअर का माँस खाने वाला एक पढ़ा-लिखा मुस्लिम समझते हैं । परन्तु 1930 में जिस समय पाकिस्तान का नामोनिशान तक नहीं था, उस समय भी जिन्ना एक ऐसे देश के बारे में बातें करते थे, जो “इस्लामिक पुनर्जागरण” का केंद्र बनेगा । 1938 में मुम्बई के एक अधिवेशन में सबसे पहली बार पाकिस्तान का झंडा प्रदर्शित किया गया । उस समय जिन्ना ने घोषणा की थी कि यह इस्लामी परचम हमें खुदा-रसूल ने दिया है । इसके तीन वर्ष बाद 1942 में एक और सम्मेलन में जिन्ना ने सरेआम कहा था कि “..पाकिस्तान नामक देश बनना जरूरी है और, यह इस्लामिक दुनिया के लिए सफलता की कुंजी है..” ।जिन्ना को सेक्यूलर मानने और समझने वाले लोगों ने उनका यह बयान भी भुला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि “…. पाकिस्तान बने बगैर अगर भारत स्वतन्त्र हो भी गया, तब भी यहाँ मुस्लिमों को कोई अधिकार मिलने वाले नहीं हैं । हिन्दू बहुसंख्यक समुदाय उन्हें हमेशा दबाकर रखेगा और उनका शोषण करेगा..”।  संसार साक्षी है कि भारत में मुस्लिमों को कितने लोकतान्त्रिक अधिकार मिले हुए हैं, और अल्पसंख्यक के नाम पर कितने विशेषाधिकार एवं छूट मिली हुई है । ज़ाहिर है कि जिन्ना के अंदर छिपा बैठा कट्टर मुस्लिम, भारत की संस्कृति और हिन्दू उदार मानसिकता को कभी समझ ही नहीं पाया । इसीलिए जब 2005 में आडवाणी पाकिस्तान गए और वहाँ उन्होंने जिन्ना को सेक्यूलर होने का तमगा प्रदान किया, तभी भारत की जनता ने समझ लिया था कि उन्होंने “दिल्ली के लुटियन झोन” और “नकली सेक्यूलरिज्म बुद्धिजीविता” के समक्ष हार मान ली है । बहरहाल, लेख का मूल विषय यह नहीं है । मूल विषय है जिन्ना की असलियत और इस्लाम की विस्तारवादी मानसिकता को समझना ।

Gandhi Jinnah 1944

वेंकट धुलीपाला (जो कि वर्तमान में उत्तर कैरोलिना के एक विवि में इतिहास पढ़ाते हैं) की पुस्तक इसे परत-दर-परत हमारे सामने खोलती है । धुलीपाला का स्पष्ट मानना है कि पाकिस्तान के निर्माण का विचार कोई “अचानक उपजा हुआ” विचार नहीं था, ना ही इसका जिन्ना के अपमान और उपेक्षा से कोई लेना-देना है, क्योंकि 1930 के आसपास जिन्ना इतने महत्त्वपूर्ण नेता थे ही नहीं कि गाँधी उन्हें उपेक्षित या अपमानित करें. असल में जिन्ना द्वारा पाकिस्तान का निर्माण एक सुनिश्चित इस्लामी विचारधारा के तहत सोच-समझकर किया गया. इसमें गड़बड़ यह हुई कि जिन्ना के मन में जो पाकिस्तान की कल्पना थी, उसमें वर्तमान उत्तरप्रदेश का एक बड़ा हिस्सा भी शामिल था, जो उन्हें मिल नहीं सका. असल में जिन्ना के दिमाग में वर्तमान यूपी ही एक “इस्लामिक स्टेट” की शुरुआत के रूप में था, परन्तु उस समय आंबेडकर ने जिन्ना के मंसूबों पर पानी फेरने में बड़ी भूमिका निभाई । संक्षेप में कहें तो देवबंद के कई प्रमुख मौलाना, जैसे मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी जो कि जमीयत-उलेमा-ए-इस्लाम के संस्थापक मौलाना अशरफ अली थानावी और अब्दुल अला मौदूदी सभी लोग जिन्ना के इस विचार के समर्थन में कूद पड़े थे, और जिसे तेजी से हवा दी तत्कालीन शायर मोहम्मद अल्लामा इकबाल ने. एक मौलाना थे हुसैन अहमद मदनी जो कि कांग्रेस के साथ थे और लगातार एक “मुत्तहिदा कौमियत” (अर्थात संयुक्त देश) की वकालत करते रहे, लेकिन वे अलग-थलग पद चुके थे और जिन्ना तथा देवबंदी मौलानाओं ने इस्लाम के मूलभूत विचार अर्थात “बहुसंख्यक पाकिस्तान देश” की अवधारणा को हाथोंहाथ लपक लिया था ।

वेंकट धुलीपाला की पुस्तक का तीसरा अध्याय बेहद रोचक है, क्योंकि इस अध्याय में धुलीपाला बाकायदा तथ्यों एवं बयानों के आधार पर डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को एक लगभग सावरकर के समकक्ष “कट्टर हिंदूवादी” के रूप में चित्रित करते हैं । वेंकट के अनुसार बाबासाहेब शुरू से ही जिन्ना के इस विचार से सहमत थे कि मुस्लिमों को हिन्दुओं से अलग होकर एक नया देश बनाना चाहिए । आंबेडकर का स्पष्ट मानना था कि हिन्दू और मुस्लिम कभी भी सह-अस्तित्त्व की भावना से साथ-साथ नहीं रह सकते । इसलिए बाबासाहेब ने जिन्ना के इस विचार का केवल समर्थन भर नहीं किया, बल्कि अपनी पुस्तक “थॉट्स ऑन पाकिस्तान” में बाकायदा हिन्दुओं को यह नसीहत भी दी कि देश का विभाजन उनके हित में है, क्योंकि यदि मुसलमानों से युक्त यह देश अगर एक विशाल संयुक्त भारत बना तो इसे शासित करना असंभव हो जाएगा और आगे चलकर मुस्लिम बहुल देश के रूप में यह “एशिया का रोगी” कहलाएगा । जब जिन्ना ने पाकिस्तान के अपने विचार पर ज़हर उगलते हुए देश के हर संसाधन में पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी माँगनी शुरू की तो सबसे पहले गाँधी ने नहीं, बल्कि आंबेडकर ने जिन्ना की कठोरतम आलोचना की । आंबेडकर ने खुलेआम जिन्ना की आलोचना करते हुए लिखा कि “अब जिन्ना जैसे लोग हिटलर की भाषा बोलने लगे हैं..” आंबेडकर ने हिंदुओं को चेतावनी देते हुए कहा है कि हिंदुओं को पाकिस्तान के निर्माण के प्रति भावनात्मक रूप से नहीं सोचना चाहिए, क्योंकि उन्हें यह सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए कि मुस्लिम लोग हिंदुओं को “काफिर” के रूप में देखते हैं और वे काफिरों की रक्षा नहीं करते, बल्कि उत्पीड़न करते हैं..।

विभाजन के बाद भी आंबेडकर ने सरेआम स्वीकार किया कि “यदि उन्हें पाकिस्तान के निर्माता के रूप में जाना जाता है तो वे प्रसन्न होंगे, क्योंकि अच्छा हुआ जो भारत ने एक अलग पाकिस्तान का निर्माण कर दिया । अब एक स्वतन्त्र भारत अच्छे से सभी क्षेत्रों में तरक्की कर सकेगा । ईश्वर ने अब भारत का भाग्य अच्छे से लिख दिया है । मुस्लिम बहुसंख्यक भय से मुक्त भारत निश्चित रूप से एकजुट, महान और समृद्ध बनेगा…”वेंकट धुलीपाला की पुस्तक का नाम एकदम स्पष्ट है “एक मदीना का निर्माण” । उल्लेखनीय है कि जब पैगम्बर मोहम्मद को जब मक्का में भारी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, तो उन्होंने मदीना को अपना “टेम्परेरी अभ्यारण्य” बना लिया था । पाकिस्तान का निर्माण भी कुछ ऐसा ही है । यह जिन्ना की सनक या किसी तात्कालिक कारणों का नहीं, बल्कि इस्लाम नामक राजनैतिक पंथ का नतीजा है । वेंकट धुलीपाला के शोध के बिन्दुवार संक्षेप में नतीजे इस प्रकार हैं ।

१) दुनिया भर में मुस्लिम कहीं भी “अल्पसंख्यक” के रूप में रहना पसंद नहीं करते हैं, वे केवल इस्लामिक यानी शरिया शासन के अंतर्गत रहना पसंद करते हैं ।

२) मुस्लिमों को सभी देशों में “समानता” वाले क़ानून से घृणा है । वे इस्लाम को “एक अलग विशेषाधिकार” के रूप में देखते हैं, इसीलिए समान नागरिक संहिता को लेकर वे सदैव नकारात्मक रहते हैं । वंदेमातरम का विरोध करना हो, योग का विरोध हो अथवा देश के संविधान को सर्वोपरि मानना हो, मौलवियों की निगाह में इन सभी को “शिर्क” (गैर-इस्लामिक) माना जाता है ।

३) 1930 से 1940 के बीच उत्तरप्रदेश के बड़े भाग में अधिकाँश मुस्लिमों का मानना था कि दुनिया भर के मुस्लिमों को एक झण्डे तले लाने का काम एक “खलीफा” द्वारा किया जाना चाहिए । गाँधी द्वारा खिलाफत आंदोलन को समर्थन देने का कारण भी यही था. ISIS के खलीफा को मिलने वाला समर्थन भी आज कहीं न कहीं मुस्लिमों के मन की थाह बताता है ।

४) पूर्ण बहुमत या पूर्ण सत्ता प्राप्त होने तक “मदीना” को एक तात्कालिक शरणस्थली बनाने की मानसिकता आज भी मौजूद है, जिसका उदाहरण है कश्मीर । जैसे ही कश्मीर में अलगाववादी तत्वों ने पैर पसारना आरम्भ किए, उन्होंने सबसे पहले कश्मीरी हिन्दूओं को वहाँ से खदेड़ दिया । इसी प्रकार आज पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की शह पर कई जिले मुस्लिम बहुल बन चुके हैं, क्योंकि यह भी उनके लिए “टेम्परेरी मदीना” ही है, क्योंकि उधर बांग्लादेश में शेख हसीना ने कट्टर इस्लामी तत्वों पर जबरदस्त आक्रमण किया हुआ है और वे चुनचुनकर 1971 के दोषी मुल्ला-मौलवियों को फाँसी पर चढ़ा रही है ।

५) चाहे असम का बदरुद्दीन अजमल हो, या हैदराबाद के ओवैसी हों । रामपुर के आज़म खान हों, काँग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने ऐसे छोटे-छोटे जिन्नाओं को शरण देकर उनका कद बढ़ाया. ये सभी भारत के अंदर अपने-अपने “टेम्परेरी मदीना” के निर्माण में लगे हुए हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश में बड़े ही “व्यवस्थित” तरीके से हिंदुओं के खात्मे, जबरन धर्मान्तरण और उत्पीडन को देखते हुए 1947 से पहले आंबेडकर ने  हिंदुओं को जो सलाह दी थी कि “मुस्लिमों को जाने दो, अलग देश बनाने दो”, वह आज सही लगता है ।

कहने का तात्पर्य यह है कि वेंकट धुलीपाला की यह पुस्तक सभी को पढ़नी चाहिए ताकि वह सही स्वरूप में भारत के विभाजन, तात्कालिक गतिविधियाँ, जिन्ना को सेकुलर समझने की भूल, मुस्लिम राजनीति और विस्तारवादी मानसिकता इत्यादि को ठीक से समझ सके ।

मुल लेख: आर जगन्नाथन
अनुवादक: सुरेश चिपलुंकर साब

Why Slum Dwellers are Bengali Speaking Muslims, Not Hindus?

Thirteen Bengali speaking Muslim residents of a slum in Sector 78, Noida (adjacent to Delhi) were arrested on 12 July 2017 for participating in mob violence on the Mahagu Moderne Society of the locality.

[Video of the Bangladeshi Illegal Immigrants being caught for stealing.]

Labeled as illegal Bangladeshi immigrants by a section of residents of the Society, the slum dwellers of Sector 78, where most of the domestic helps of the area live, staged a protest on 13 July 2017 by showing their Aadhaar and Voter Cards.

Illegal Bangladeshi immigrants stone pelting at Mahagu Mordene Society Noida
But what so many Bengali speaking Muslim slum dwellers are doing in Sector 78 of Noida? It’s not only Sector 78, but whole of Noida, Gurgaon, Bangalore, Mumbai and all major cities of India have such Bengali speaking Muslim population.

Illegal Bangladeshi immigrants stone pelting at Mahagu Mordene Society Noida
You ask them about their original residence or permanent address and they will give you the name of a district of West Bengal bordering Bangladesh. If their mobility from West Bengal was for economic reason, then there should have been three times more such slum settlements of Hindu Bengalis from West Bengal in all those cities for the same reason, which is not the case. This fact raises a big question. In some places these Bangladeshi Muslims even use Hindu names to cover up their true identity.

Illegal Bangladeshi immigrants stone pelting at Mahagu Mordene Society Noida
Let me tell you how easy it is to get Aadhaar Card and Voter Card. The local political leaders (MLA, Panchyat President etc.) who are more concerned about vote based politics issue certificate of residence, in their official capacity, to Bangladeshi Muslims immigrants in West Bengal. This has been decades old practice during Congress, Communists and Trinamool Congress rule in the state. This certificate is sufficient to get a Ration Card, Voter Card and then Aadhar card.

Illegal Bangladeshi immigrants stone pelting at Mahagu Mordene Society Noida
So possession of Aadhaar Card and Voter Card, in this situation, cannot be proof of Indian citizenship. Leftist, secular, liberal intellectuals of India are not concerned about the presence of tens of millions of Bangladeshi Muslims in and around different cities of India. They are more interested in destabilizing the country for serving their shallow interests.

Sooner these Bangladeshi Muslims are identified and deported is better. Otherwise, stone pelting Muslims will create Kashmirlike situation in many other places of the country in coming future.

लव जेहाद – कैसे, नुकसान और बचाव क्यों? 

लव जेहाद कैसे?

१. मुस्लिम लडको को मौलवियों व अन्य इस्लामिक संगठन द्वारा हिंदू लडकियो को फ़साने को ना केवल प्रोत्साहित किया जाता हैं अपितु इनाम के तौर पर या कहे घर बसाने के नाम पर बड़ी रकम भी रखी जाती हैं । यह राशी जिहाद के नाम पर, ज़कात के नाम पर, जिज़्या के नाम या आपके द्वारा पेट्रोल पर दी हुई रकम से ली जाती हैं ।

२. कम से कम ४-५ लड़के (ज्यादा भी हो सकते हैं ) आपस में मिल के हिंदू लडकियो को चुनते हैं फ़साने के लिए । मुस्लमान हमेशा समूह में रहते हैं अपने कायर स्वाभाव की वजह से इसलिए उन हिंदू लडकियो को बचाना इतना सरल नहीं होता ।

३. ये लड़के गर्ल्स कालेज के बाहर, कंप्यूटर संसथान के बाहर या अंदर, या कोचिंग संस्थानों के आसपास रहते हैं । कभी-२ लेडिस टेलर की दुकान पर ४-५ लड़के लगे ही रहते हैं । इन्टरनेट पर सोशल नेटवर्क से लेकर याहू चैट रूम तक हर वो जगह जहा इन्हें हिंदू लड़किया मिल सकती हैं वहा ये लगे रहते हैं घात में ।

४. ज्यादातर मौको पर ये लड़के खुद को हिंदू ही दिखाने का प्रयास करते हैं । अच्छा मोबाइल सेट, कपडे, वा मोटर साइकिल आकर्षण के तौर पर इनका हथियार होते हैं । जिम में घंटो कसरत भी ये लोंग इसी लिए करते हैं ताकि अधिक से अधिक हिंदू लड़किया फसा सके ।

५. दक्षिण भारत में तो मुल्ला मौलवी इन लडको के लिए पर्सोनालिटी डेवेलोप्मेंट कोर्से चलवा देते हैं । किस तरह बात की जाए लडकियो से, उन्हें कैसे तोहफे दिए जाए । और किस प्रकार सेक्युलर बन कर उनसे सिर्फ प्यार मोहब्बत की बात कर के खूबसूरत सपने दिखाए जाए ।
६. फिल्म उद्योग में बढते खान मेनिया से ये अब और भी सरल हो गया हैं | ज्यादातर हीरो खान होते हैं ऐसी मानसिकता लड़कियों में तेजी से बढ़ रही हैं जो की समाज के लिए बहुत की घातक हैं ।

७. अगर हिंदू लड़की निश्चित समय में नहीं फसती तो लव जेहादी अपने किसी दूसरे मित्र को उसके पीछे लगा देता हैं और खुद किसी और के पीछे लग जाता हैं । इसे लड़की फॉरवर्ड करना कहते हैं ।

८. जल्द ही ये लड़के भोली भाली हिंदू लडकियो को अपने प्यार के जाल में फसा लेते हैं । उनमे से कई तो शारीरिक सम्बन्ध भी स्थापित कर लेते हैं । ज्यादातर घटनाओ में मुस्लिम लड़के वाईग्रा का इस्तेमाल करते हैं ताकि लड़किया संतुष्ट रहे और उनके खानपान से आई नापुसकता छुपी रहे ।

९. एक बार लड़की से सम्बन्ध स्थापित हो गए  ो लड़की को घर से भागने के लिए मनाने में इन्हें देर नहीं लगती । कही बार ये पहले भी मना लेते हैं पर ऐसा कम ही होता हैं ।१०. भगा के लड़का लड़की को शादी से पहले इस्लाम कुबूल करने पर मजबूर करा लेता हैं इस्लामी तरीके से शादी के नाम पर और लड़की फस जाती हैं जाल में क्यों की लड़की को वापस जाने की बात तो दिमाग में आती ही नहीं ।

११. लड़की को भगा के इस्लामिक शादी कर ले जाने के बाद लड़की के साथ निम्न में से एक घटना होती हैं ।

क ) लड़का लड़की का पूरी तरह भोग कर के उसके शहर से चार पाच सौ किलोमीटर दूर बेच देता हैं किसी अधेड उम्र के मुस्लमान आदमी को जिसको उसकी बदसूरती की वजह से औरत नहीं मिली होती या उसे बस औरतो का शौक होता हैं । यानि लड़की को वैश्या व्रती के दल दल में डाल देता हैं ।

ख ) लड़की को पता चलता हैं के लड़का पहले से ही २-३ शादिया करे बैठा हैं । और उसे भी नकाब में बंद एक कमरा मिल जाता हैं ।

घ ) लड़की की किस्मत अच्छी होती हैं और वो उसकी पहली बीवी ही निकलती हैं । इस पारिस्थि में लड़की नकाब में तो कैद होती हैं पर उसे अपने २-३ सौतनो का इन्तेज़ार करना पड़ता है । और लड़के की गुलाम बन कर रह जाती हैं क्यों की वो इस्लाम कुबूल कर चुकी होती हैं और इस्लाम में औरत को तलाक का कोई अधिकार नहीं होता ।

लव जेहाद से नुकसान

१. एक हिंदू लड़की के भागने से कम से कम ८ हिन्दुओ की हानि होती हैं ।

२. जो लड़की भागती हैं वहा एक, जिसके साथ भागती हैं उसके लिए कम से कम ४ बच्चे पैदा करती हैं, अगर वहा लड़की ना भागती और किसी हिंदू के साथ शादी करती और वहा समझदार होता तो कम से कम ३ बच्चे पैदा करता इस प्रकार १+४+३=८ हिन्दुओ का नुकसान होता हैं ।

३. अब जरा अनुमान लगाइए के ८ हिंदू अगले पच्चीस साल में ३ बच्चे भी पैदा करते तो २४ और वो अगले पच्चीस साल में ७२ इस प्रकार सौ साल में ४३२ हिन्दुओ का नुकसान होता सिर्फ एक हिंदू लड़की के जाने से ।

४. वही एक मुस्लमान एक हिंदू लड़की भागने पर उस से ४ बच्चे पैदा करता हैं वो ४ अगले पचीस साल में १६ बच्चे पैदा करते हैं वो १६ अगले पचीस साल में ६४ बच्चे पैदा करते हैं इस प्रकार ५१२ मुसलमानों की वृधि होती हैं ।

५. अब जोडीये जरा ४३२ + ५१२ = ९४४ हिन्दुओ का नुकसान सौ साल में बिना किसी तलवार के जोर के और कहने को इस्लाम दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला मजहब ।

६. इन्टरनेट पर उपलब्ध आकडो के अनुसार हर साल १ लाख से ऊपर हिंदू लड़किया मुस्लिम लडको के साथ भाग रही हैं तो अब जरा गुना करिये ९४४ * १००००० = ९४४००००० यानि नौ करोड़ चौवालीस लाख का अंतर बैठेगा सिर्फ एक साल में हिंदू लड़कियों के भागने के नुकसान पर अगले सौ सालो में । ये आकड़ा बड़ा जरुर लगता होगा पर इसमें मृत्यु दर, नापुसकता दर, वा अन्य घटी  ी लगा ले तो भी ये अकडा करोड़ों में ही रहेगा ।
७. इस आकडे के अनुसार अगर सिर्फ २० साल मुस्लिम इसी दर से लव जेहाद का अभियान चलाते रहे तो उनकी आबादी में कितनी वृधि होगी इसका अनुमान आप खुद ही लगाइए यानी आने वाले समय में हिन्दुओ का सुपडा साफ़ हो जाएगा सिर्फ इस छोटे से लगाने वाले बड़े हथियार से । लड़किया दोनों समुदायों में कम हैं पर हिंदू आबादी पर हो रहे इस विशेष तकनिकी हमले की वजह से हिंदू वृधि दर को नकारात्मक में जाने में देर नहीं लगेगी ।

८. जो हिंदू ८०० सालो की जबरदस्त मार काट के बावजूद ८० करोड़ बचा हुआ था वो मात्र २० साल के निरंतर एक दर के लव जेहाद से अगले सौ सालो में लुप्त होने की कगार पर पहुच जाएगा । जैसे आज यहूदियो का हाल हैं ।

१. लड़की के पालन, पोषण शिक्षा पर हिंदू मा-बाप कितना खर्च करते हैं पर जब हिन्दुओ को अपनी कौम को बढ़ाने का वक्त आता हैं तो मुस्लिम लड़के हिंदू लडकियो को ले उड़ते हैं । यह तरीका मुसलमानों को खुद के बच्चे पैदा कर के उन्हें पाल पास के बड़ा करने से भी सरल हैं, पका पकाया खाने का सरलतम तरीका हैं लव जेहाद ।

लव जेहाद से बचाव

१. लड़कियों को बचपन से ही वैदिक धर्म के मूलभूत सिद्धांत और इस्लाम की कार्य निति समझा दीजिए । ये कार्य आप अपने बच्चो को खाने के टेबल पर भी सिखा सकते हैं । बच्चो को बाल सत्यार्थ प्रकाश और किशोरों को सत्यार्थ प्रकाश पढ़ने को अवश्य दे ।

२. किसी भी प्रकार से किसी भी मुस्लिम को घर के अंदर मत घुसने दे ।

३. अगर कोई मुस्लिम लड़का आपकी लड़की के आसपास फटक रहा हैं तो फ़ौरन कारवाही करिये । यदि खुद आप समर्थ नहीं तो अपने सर्वप्रथम अपने क्षेत्र के लोगो की उसके बाद बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वं सेवक संघ, आर्य समाज, या अन्य किसी भी हिंदू संगठन की मदद ले ।

४. पुलिस से सहायता लेने में भी ना चुके ।

५. अपनी लड़की से खुल के बात करे अगर उसका कोई हिंदू प्रेमी हैं तो उसे घर पर बुला कर मिले । इस बात से निश्चित हो जाए के वो हिंदू हैं । व्यस्त लड़की पर मुस्लिम जेहादी जल्दी सफलता नहीं पा पाते ।

६. अंतर जातीय शादी को अब मान्यता दे । ये देखे के लड़के का चरित्र कैसा हैं और वो करता क्या हैं ना की उसका उपनाम । किसी भी जाती का हिंदू एक मुसलमान से हज़ार गुना बहेतर हैं क्यों की उसके पूर्वजो ने अपना शौर्य दिखा के अपने धर्मं को नहीं छोड़ा ।

७. दहेज ना ले, ना दे और लड़की की जल्द से जल्द शादी करा दे ।

८. मुसलमानो का आर्थिक बहिष्कार करे । और अपने क्षेत्र के लडको को उनकी लड़कियों से शादी करने को प्रेरित करे । ये बदले की भावना से नहीं बल्कि सुरक्षा की भावना से करे । इस से उस मुस्लिम लड़की का भी उद्धार होगा ।

९. मुस्लिम लड़का हिंदू होने को भी तैयार हो सकता हैं । पर अक्सर ऐसे मामलो पर भरोसा ना करे । इस्लाम में काफिरो यानि गैर मुसलमानों से झूठ बोलना जायज हैं इसे तकिया कहा जाता हैं । लड़का सिर्फ लड़की फ़साने के लिए ऐसा नाटक कर सकता हैं इसलिए जोखिम मत उठाये ।

१०. अगर कोई मुस्लिम इस प्रकार की घटना में हिंदू मुस्लिम एकता का हवाला दे तो उस से पूछियेगा के क्या वो अपनी बहन की शादी किसी हिंदू से करा रहा हैं । हिंदू मुस्लिम एकता सिर्फ हिंदू लड़कियों की शादी मुस्लिम लड़को से शादी करने से तो नहीं आयेगी इसमें उन्हें भी बराबरी का सहयोग देना होगा ।

११. अगर लड़की भाग भी गई हैं तो उसे वापस लाने में संकोच ना करे । इसमें कोई शर्म की बात नही बल्कि लड़की को वापस लाने से आप अपनी गलती सुधारेंगे । हिंदू संगठनो में वा आर्य समाज के माध्यम से आपको ऐसे बहुत से राष्ट्र भक्त युवा मिल जाएँगे जो उन लडकियो को स्वीकार करने को तैयार हो जाएँगे ।

Massacre of Swami Amarnath Cave Pilgrims 

By Kashinath Pandita

Pilgrims anywhere in the world are the messengers of peace. They undertake pilgrimages to seek inner peace for themselves and for the world at large.
Shame on Theo-fascists, shame on followers of a false faith and shame on mercenaries who undertake killing of innocent seekers of Gods goodwill to satisfy the inhuman instincts. Do not think that the age of barbarians and cannibals is over. We have them around and we have also around those who worship and adore cannibalism. The fight between virtue and vice or good and evil is the history of mankind and we in this country are in the thick of that battle.
Theo-fascist attacked Amarnath pilgrims somewhere near Khannabal in Anantnag district in which seven pilgrims, six of them women, were killed and 32 others wounded. The previous attack of Theofascists on Amarnath pilgrims was in 2000 at Pahalgam in which 30 pilgrims were killed. In between, Theofascists never ceased issuing warnings to the pilgrims that they can be attacked. Why do these barbarians attack pilgrims? The answer is simple. They call Kashmir darul harbb meaning the land of war in accordance with the tenets of their faith. It has to be turned into dar-ul-isalam or the abode of peace only by effacing all traces of non-Islamic religion and by destroying their cultural symbols. 

Mukesh Patel the brave heart who kicked out the Terrorist from the bus
A secular and democratic government is supposed to protect its citizenry against the attacks of the crusaders of Theofascism. Weeks and months before the commencement of the pilgrimage to Amarnath, entire government machinery in the State and at the Centre was galvanized into action and most meticulous security arrangements were put in place to ensure that pilgrimage passed on without any abnormal and tragic incident. But the tragedy has happened. A number of points need to be elucidated.
Harsh Desai, The real hero
Firstly, as the pilgrimage is extremely sensitive, how come that a bus carrying pilgrims remained unregistered with the traffic police and Shrine Board authorities and why was it allowed plying on a vulnerable transit route called National Highway without proper protection.  What does it mean to say that the bus was not part of the caravan proceeding to Jammu after completing the pilgrimage?  There are no buyers of the theory that the security cover is withdrawn after 7 PM on the pilgrim caravan. Does it mean that after 7 PM, the entire stretch of the National Highway passing through Anantnag district is controlled by the terrorists and that no security will be provided to people travelling beyond the specific hours. If that is the case, then there is much truth in believing that the affected districts of South Kashmir are no more under the control of civilian administration. Why not hand them over to the army and impose relevant security rules and laws to eliminate militancy lock, stock and barrel. Security and safety have no time limit. This security lapse becomes more outrageous when we are told that hours before the terrorists struck at about 8.20 pm, they had attacked two police posts but met with resistance and fled the scene. Why was not this message flashed to all units of security forces posted at various places along the Highway?  It is no excuse to say that the ill fated bus was punctured and left behind the caravan as the puncture was being repaired by parking the bus on the roadside. Why did not the traffic police come to know about it and why did it not inform security authorities to ensure safety of the stranded bus? These questions straightaway convince us that there was grave security lapse with dire consequences. Those responsible for the lapse should be sacked immediately. They don’t deserve to be on the pay roll of the Security chapter of the country. It is now the duty of the police and security authorities to hunt down the culprits and bring them to book. 

There was threadbare input from the Home Ministry about the likelihood of attack on the pilgrims. Why were these instructions and input taken lightly? For nearly three to four hours prior to attack on the stranded bus carrying pilgrims, the terrorists had been roaming the area and had targeted two police posts as well. Where were the security authorities and functionaries lost during those intervening three or four hours? The so called foolproof security cover, claimed by the security and police authorities has proved farcical. Who is going to trust them for their superfluous claims? The contention that the bus in question was unregistered is untenable. What is the duty of traffic police and why did the concerned functionaries neglect their duty.

We know that three districts of South Kashmir are infested with Theofascist gangsters. It is many months that they have been striking at will and causing damage to innocent people. This menace has to be uprooted at all costs. Those who swarm in crowds and throw stones on security forces to obstructing anti-terrorist operations are the worst enemies of the people and their government; they are seditionists.  They are testing the patience of the civilian government. These are seditious acts and need to be dealt with under the relevant sections of laws. 

Many political leaders, particularly those in opposition, have just done the lip service of condemning the attack and consoling the bereaved families. Is that all what they should do? Are not they concerned with what repercussions the attacks can have in wider space of the country? Is it not their duty to sternly warn the terrorists to surrender and lay down their arms? Is it not their duty to tell their party workers and constituencies to declare that they would help the police in apprehending these criminal elements? Is it not their duty to bring out mass rallies of their party men and protest against misuse of religion as an instrument of achieving political goals?  In his tweet, the former chief minister has asked the Home Ministry to ensure safety of Kashmiri Muslim students in Indian Universities. We welcome his expectation that Kashmir-bred Theo-fascism sends a wave of ahimsa across the length and breadth of the country. Had his party and its cohorts played constructive role during the stone-throwing episodes in the valley last year, things would not have gone that bad today. Had not the NC stalwarts defended hooligans and stone throwers and called their acts as “self defence” we would not be facing shame and condemnation today. This is true of some more political groups in the valley.

In final analysis, there is lawlessness in parts of South Kashmir. Government has shown tremendous patience and restraint in meeting terrorist challenge by legal means. In the history of nations, a time comes when the State must exercise its might. Attack on religious pilgrims is the most dangerous thing for our country — a mosaic of religions and cultures — because it endangers peaceful coexistence among people of different denominations. 

The End

Kashmiriyat died in January 1990

There is saying that there is a lull before the storm.

The gathering of the storm.

Pandit Tika Lal Taploo

September 14, 1989 was a sunny day when Pandit Tika Lal Taploo, President of Bharatiya Janata Party (BJP), Kashmir Chapter and a lawyer by profession, came out of his home in Bhan Mohalla locality of Srinagar and headed to the High Court where he practised law. As he stepped out, he saw a small girl crying. On recognizing that the child was of his Muslim neighbour, he lifted her in his arms, turned round and went straight to his neighbour to ask “Why the child was crying”. The mother of the child said that her daughter needed some items of writing material but she had no money to buy these. Tika Lal took out a five rupee note from his pocket and handed it over to the woman. To the child he said, “My child, school is the place for you”.

Tika Lal left them and turned to go to his work place. He had hardly walked 70 steps when three persons with faces wrapped in dark cloth appeared at the blind turn of the lane. Two of them kept standing while the third moved a few steps forward and came in line with Tika Lal. He took out a weapon, aimed at Tika Lal and said, “You are the BJP leader! Come then”. He pulled the trigger and bullets pierced the chest of Tika Lal, who fell down dead in a pool of blood.

Eternal Journey of Tika Lal Taploo 

The Bar fraternity, mostly Muslims, organized a condolence meeting in the premises of the High Court and at Tika Lal’s residence, the one who cried and sobbed the loudest among a large number of mourners, was the mother of the child, Tika Lal had lifted in his arms just moments ago.

Neelkanth Ganjoo

Barely three weeks after this murder in Srinagar, unknown gunmen shot and killed another Kashmiri Pandit (Kashmiri Hindu), retired Judge Nilakanth Ganjoo in broad day light in Maharaj Bazaar, Amira Kadal. He had flown in from New Delhi and was heading homewards.

Maqbool Bhat

Obviously, someone was keeping track of him while in close contact with the gunmen. Justice Ganjoo, Sessions Judge in Srinagar had given a death sentence to Maqbool Bhat, the leader of Jammu & Kashmir National Liberation Front, whom he had found involved in the murder of Amar Chand, a CID Police Sub–Inspector ofJammu and Kashmir Police, resident ofNadihal village of Baramulla district. These two killings of Tika Lal and Nilakanth Ganjoo sent a shock wave down the spine of the Pandit minority community of the Kashmir Valley.
Gunning down of two outstanding members of their community in the autumn of 1989 within a span of only three weeks was ominous for the Pandits. It made them skeptic towards the law and order situation in the State and they started to feel deeply concerned about security of life. What baffled them more was that two Muslim witnesses on whose deposition Judge Ganjoo had based the judgement roamed as freemen. That evening, Radio Kashmir announced the incident in just one sentence; “Unknown assailants gunned down a former Sessions Judge in Maharaj Bazaar, Srinagar”. Fear-stricken Pandits, with anguish written large on their face, huddled up in their homes to think over the seriousness of the threats to which they were exposed. Was death looming large over their heads? Their apprehensions were not unfounded.

Elections and Muslim United Front (MUF)

Farooq Abdullah, then Chief Minister & Co-Founder of JKLF

Two months before the killing of BJP leader Tika Lal Taploo, Jammu and Kashmir Chief Minister Farooq Abdullah had ordered the release of a number of Kashmiri Muslim youth from Srinagar jails, who were alleged to have crossed the Line of Control (LoC) and received training interrorist camps in Muzaffarabad, the capital of Pakistan Administered Jammu andKashmir. They were the early activists ofMuslim United Front (MUF), a newly formed political group that contested 1987 elections to the Legislative Assembly  of Indian Administered Jammu and Kashmir and were charged with sedition against the State. MUF had strongly protested against alleged rigging of elections by National Conference–Congress combine, which later on formed the coalition government with Farooq Abdullah in the driver’s seat. 

MUF claimed that National Conference musclemen had let loose reins of terror during the elections. Their polling agents were assaulted, manhandled, abused and humiliated. Bringing National Conferences oppressive measures and acts of intimidation to the notice of the Election Commission evoked no reaction from the latter. It convinced MUF that the entire election machinery was functioning in a partisan manner. Although they had their reasons to lose trust in the fairness of the Election Commission, the Kashmiri Pandits had no role in these political rivalries. A community with barely 3 per cent population had no say in anything, yet the community was to be made a scapegoat in this political tug of war.

MUF, the frontline activists of Kashmir’s Jamaat-e-Islami, projected the rigging episode as a step towards suppression of Muslim predominance in the State. Armed resistance was the option and there were takers of the option in the Valley of Kashmir as well as in Pakistan Administered Jammu and Kashmir. The idea of Islamic resistancemovement highly suited late Zia-ul Haq’s (Military Dictator of Pakistan) ‘OperationTopac’ plan for Jammu and Kashmir, and Pakistan’s super intelligence organization,Inter–Services Intelligence (ISI) came into action.

Jammu Kashmir Liberation Front (JKLF)

ISI planned roping in of political activists in Pakistan Administered Jammu and Kashmir and their UK-based strong diaspora. The JKLF, altogether with its twin centers in Pakistan Administered Jammu and Kashmir and UK, initiated armed insurgency in the Kashmir Valley in the mid-1980s with outright support of ISI.  It opened its account of killing Hindus with the kidnapping and subsequent murder of Indian Assistant Commissioner Ravindra Mhatre in Birmingham in 1984.

Amanullah Khan

Amanullah Khan, originally from Astorein Gilgit Baltistan (Pakistan Administered Jammu and Kashmir) but settled in Luton, UK, faithfully carried out ISI’s instructions to his gangsters and coordinated an armed insurgency in the Kashmir Valley. JKLF secretly raised its cadres in the Valley and claimed the killings of Pandits beginning with the murder of Tika Lal Taploo.

Acting under the instructions of ISI, JKLF adopted a two-pronged strategy for activism in the Kashmir Valley. These were (i) Kalashnikov and (ii) a massive disinformation campaign. JKLF commanders drew power from Kalashnikovs that flowed to them from Pakistani arsenals through their handlers in training camps in Pakistan Administered Jammu and Kashmir. The Pakistani intelligence agencies laid much emphasis on launching a massive disinformation campaign across the world saying that there was an indigenous freedom movement in the Kashmir Valley against ‘Indian occupation’ and that Pakistan was only extending moral and diplomatic support to it. Using JKLF as its hand tool, ISI made deep inroads into the large diaspora of Pakistan Administered Jammu and Kashmir in UK and in the Kashmir Valley. Many youth in Pakistan Administered Jammu and Kashmir and the Valley were enrolled as activists and contributors to the political formation of JKLF. ISI opened numerous terrorist training camps close to the Line of Control (LoC) where retired Pakistan army officers were employed as trainers for the youth from the Kashmir Valley. They received short and long term training in fighting tactics, after completion of which they were given arms and ammunition and asked to return/infiltrate into the Indian administered part of Jammu and Kashmir for undertaking terrorist and subversive activities.

Realizing that the diaspora of Pakistan Administered Jammu and Kashmir could play a crucial role in fomenting armed insurgency in the valley, Pakistani intelligence agencies also adopted a two pronged strategy. First the people in Pakistan and Pakistan Administered Jammu and Kashmir had to be indoctrinated with the concept of Islamic Jihad in which the Hindu as kafir (infidel) becomes the target. Hating Hindus became the refrain of this massive propaganda. The people were told that Muslims were suppressed and oppressed by the Hindus in Kashmir. The second part of the strategy was to whet the lust of the activists in Pakistan Administered Jammu and Kashmir for domination over the entire State of Jammu and Kashmir, if the Valley was cleansed of its Hindu population, no matter howsoever tiny and insignificant. They were told that once the Kashmir Valley was cleared of impure Indians and Hindu presence, they would be the masters of that part and enjoy the prosperity to their heart’s content as Kashmiris would be nothing more than the hewers of wood and drawers of water for them.

ISI’s Plan

Hamid Sheikh

A number of Kashmiri youth whose release order from the jail was issued by the then Chief Minister Farooq Abdullah were among the first batch of Kashmiri youth who had crossed over and landed in the terrorist training camps in Pakistan Administered Jammu and Kashmir. While returning to Kashmir they had been arrested by the Border Security Forces and handed over to the local Police which registered cases against them. The top four among them, namely Hamid Sheikh, Ashfaq Wani, Javed Mir and Yasin Malik were the pioneers of the armed insurgency in the Valley, with the assignment to begin with decimation of thePandit community. The killings of the two prominent leaders referred to at the opening of this Study-paper, has to be seen in this background.

Ashfaq Wani
Javed Mir

It was widely rumored that clandestine crossing of the Line of Control by Kashmiri youth for receiving training and arms in training camps in Pakistan Administered Jammu and Kashmir was facilitated bybribing the Indian Border Security Forces. The slogan “to Sopore, Kupwara (Cities close to the LoC) and the other side” was on the lips of adventurous Kashmiri youth at that time. The disinformation strategy had two components; Feeding international as well as vulnerable sections of the Indian press, both print and electronic, with false and fabricated stories, lies and canard of Indian army’s ‘oppression and suppression of Kashmir’s nationalist uprising’. The second was the indoctrination of Kashmiri Muslim youth lured to the terrorist training camps in different places in Pakistan Administered Jammu and Kashmir with hate-Hindu and hate-India propaganda. The second part of this strategy spelt disaster for the Kashmiri Pandit community when these indoctrinated and trained gunmen returned to the Kashmir Valley adequately equipped with arms and indoctrinated with rabid fundamentalist ideology.

Perhaps, it is just possible that in the training camps, these JKLF gunmen were not strictly told to unleash terror against the Kashmiri Pandit community as a whole. But a young Muslim indoctrinated with fundamentalist ideology and with a deadly automatic weapon called in his hands wanted a target – Maligned Kashmiri Pandit was the sitting duck. 

Amanullah Khan, the chief of JKLF had confessed the same to a Pandit rights activist in a seminar in the European Parliament in Brussels in 1992. When the rights activist told him that his so-called freedom fighters had let loose brutal killing, rape, kidnapping, intimidating, issuing warnings through loudspeakers to run away from the Kashmir Valley to the Pandits, how could that be called a ‘freedom movement’. Amanullah Khan replied that was not the agenda but ‘the boys back to Kashmir with weapons became uncontrollable. They attacked Pandits because the Pandits did not join the armed struggle’.

After the National ConferenceCongress coalition government resigned under the pressure of the militants, armed youth almost ruled the lawless Valley of Kashmir. Farooq Abdullah went to London to play golf and his dismissed colleagues in the Council of Ministers hid their heads in Jammu where they illegally occupied government bungalows and some of them entered into secret liaisons with the Kashmiri insurgency leadership.

Change of plans

Alarmed at the success of JKLF cadres in dislodging the elected government in Srinagar (Summer Capital of Indian Administered Jammu and Kashmir), and noticing the rising crescendo of anti-India sentiment among the Kashmiri people in the Kashmir Valley, ISI changed the goal post and came out in its true colors. ISI found it unavoidable to send a message of‘thus far and no further’ to the JKLF. ISI sponsored a parallel terrorist group, namedHizbul–Mujahideen (HM). Rivalry between the two ideologically divergent groups resulted in the killing of many JKLF leaders and activists in the Valley.

Nevertheless, Hizbul Mujahideen carried forward the policy of Pandit massacres initiated by the JKLF. In response, Amanullah Khan gave a call for a ‘Great March’ into Indian Administered Jammu and Kashmir by mass violation of the ceasefire line at the border town of Uri. Panicked by the consequences of violating the Line of Control by the JKLF leadership, and totally opposed to JKLF’s proclaimed ideology of an United Jammu and Kashmir, Pakistani troops opened fire on the obstinate marchers killing at least 17 of them and wounding many more. This was 1992, the second year of insurgency in Kashmir.

Thereafter ISI’s strategy of Kashmir insurgency changed. It sidelined JKLF charging its proclaimed ideology of an Independent, United Jammu and Kashmir as diametrically opposite to Pakistan’s claims to the entire State. ISI raised new armed groups in the Kashmir Valley, dozens of them under different names to play the central role. Most of them were affiliated to numerous fundamentalist-terrorist organizations based in Pakistan receiving all round support like arms, ammunition, money, logistics, equipment and direction from ISI’s Kashmir chapter. In due course of time, all these armed groups were sucked up by Pakistan’s two major terrorist organizations like Lashkar-e-Taiba and Jaish-e-Muhammad.

Days after the killing of Tikalal Taploo on September 14, 1989, a Kashmiri Pandit published a letter in Kashmir Times asking insurgency leadership to publicly spell out their policy towards Kashmiri Pandits in the light of the murder of a Pandit political leader. The response in next day’s issue said, that the Pandits should join the armed movement for the liberation of Kashmir from the ‘occupation of India’ failing which they should be prepared for any fate.

In private and in public, in homes and in mosques, Kashmir Valley’s Muslim society was in revolt. In their mass congregations, India was painted as the occupier and the Kashmiri Pandits were dubbed as the spies of India. The tag that Pandits are the spies of India in Kashmir never left them. After the 4th of November, 1989, the day Judge Ganjoo was gunned down, the scenario envisaged by Zia’s ‘Operation Topac began to unfold layer after layer. Firing here and a blast there foretold of coming events. Muslim clergy intensified their hate Hindu tirade in public and private assemblies and in Friday congregations, they poured venom in their sermons and projected Kashmiri Brahmans – this bare 3 per cent religious minority –  a source of threat to the 97 per cent Muslim majority in the perceived Islamic theocratic State. Outright denigration of India, Indian democracy, Indian army and establishment were meant to unnerve the Pandits.

The Exodus

It was 19th of January, 1990 and days were cold and nights bitter, though there was no snow on the ground. Around 9 PM, loud and thunderous Islamic and pro-Pakistan slogans raised collectively by a multitude of humanity and relayed through powerful loudspeakers almost pierced ear drums. These slogans were not new to Pandits in the Valley of Kashmir as they were familiar to such outbursts, however the very odd hour, the tumultuous bang and the intriguing spontaneity besides the pressing loudspeakers into service, all spoke threateningly that a storm was brewing in the Kashmir Valley.

Suddenly, telephone bells began ringing loudly in the houses of most of the Pandits in Srinagar. Mobile phones had not been introduced then. Each caller on the other end of the line asked his relative, friend or acquaintance whether they were safe. This question carried more meaning underneath its simple words. The callers told their respondents to come out of their houses in that dark and dreary night and see for themselves what a strange scenario was unfolding on the streets and squares of the city of Srinagar. Scenes on the streets, squares and open spaces in the city were to be seen to be believed. Masses of Muslim population, young, old, children, and women came out of their homes, crowded the streets, gesticulating vigorously and yelling slogans in favor of Islam, Pakistan and the insurgency. 

Crowds of people carried rugs, carpets, mats and furnishing and spread it out on the streets and squares. They brought wood and lit bonfires to keep their bodies warm. People sat, squatted, danced, shook fists made violent gestures as loud speakers were fixed and microphones blurred a mix of Quranic verses, revolutionary songs, anti-India vitriolic and the supremacy of Islamic faith, all by turn making rounds from one to another speaker, each speaker more rabid fire brand than his predecessor. Islamic slogans, profuse admiration for Pakistan, stories of the heroes of early Islamic conquests, the paradise created by Allah for the Momin (pure) and hell fire for the kafir (unbelievers) etc. were the major themes of their outpouring. Speakers praised Islam as the best religion God had sent through the Prophet. The crux of these surcharged utterances was that all symptoms of kufr (heresy), buthparast (idolatry) and dualism as with the Hindus had to be cleaned from darul islam (the place of peace). Spirited stories of the heroes of early Islam like Omar and great commanders like Sa’d bin Waqqas and Tariq and others were recounted conveying that Islam had not lost the strength of destroying non-believers. This rant continued till wee hours. The message went to the Pandits that they were in the line of fire.

Hari Parbat, The Shakta Peeth

Like frightened pigeons, the Pandits huddled up in their nests and kept vigil all night. Not a single soul came out of his house to go to the temple for prayers or to Hari Parbat heights to pay usual obeisance to the deity. The night-long tirade against non-Muslims on the one hand and lionizing of Islamic war lords on the other, snatched whatever remnant of peace of mind they were left with. The question that caused them grave distress was how they could live in the Valley of Kashmir without the goodwill of the majority community with which they have had centuries of good and brotherly relations. To Kashmiri Pandits his Muslim neighbor was neither an enemy nor a rival just because of their very insignificant rather negligible numbers. For the first time in the history of Jammu and Kashmir this open and unabashed tirade was let loose against them on such a massive scale. The administration collapsed and law and order were thrown to winds. The police deserted their posts and the Pandits were left to themselves with their survival hanging in balance.

The Pandits found that overnight their neighbors had changed color. Their idiom changed as if they had thrown off the mask they wore for such a long time. Pandit and Muslim neighbors known to one another for generations began to behave as strangers. Suspicions loomed large and in a few days the entire atmosphere changed and the Pandit came to be called ‘the other’. The government was knocked out by a single night of defiance and revolt and the next morning not a single policeman was visible anywhere in the city. They had withdrawn to their barracks or hid in their homes as the administrative machinery had collapsed and law and order crumbled.

From the next morning viz. 20th of January, 1990 it was the rule of the mosque, the priest and the Islamists. Loud speakers fixed to mosque tops, blurred uninterruptedly cautioning the Pandits to leave the Valley. The refrain of their slogans was that they wanted their Kashmir without Pandit males but with their women folk. Traditional Kashmir Muslim society has always been respectful of Kashmiri Pandit womenfolk and this shameful and shocking slogan showed that only a fringe section of Kashmir Muslim society indoctrinated in hate mania was out to disrupt communal harmony.

However, the hate campaign, carried forward through barbaric and inhuman means of violence, struck fear among the entire Kashmiri population to the extent that nobody was prepared to show even the slightest goodwill to the Pandits. Al Safa, a popular Urdu daily of Srinagar minced no words in telling the Pandits to leave the Valley within hours if they wanted to save their lives and honor. Loud speakers fixed on mosque tops blurred a profusion of warnings of similar type. More and more anti-India demonstrations were to be seen on the streets in which demonstrators were mad with anger, hate and revenge. Fear stricken Pandits did not find any source that could assure them at least the safety of life. In its evening news bulletin, Radio Kashmir took the name of the Kashmiri Pandits gunned down by terrorists. The gruesome stories of murder of hapless Pandits unnerved the community members. There was no sense of approaching majority community for protection and help because the neighbors, too, were in the grip of fear heightened by the collapse of law and order. The dynamics of secret and selective militancy so rigidly drilled into the heads of the actors, had reached a level that the son who returned after training never disclosed to his parents and family members where he had been and on what mission. Indoctrination was of the level that even parents began to fear their sons. This is best explained in the television interview which Bitta Karate gave to the security officials after he was arrested and interrogated by security agencies.

Bitta Karate, Then a dreaded terrorist and killing machine
Bitta Karate, Now a Respectable Politician after killing more than 20 Kashmiri Pandits

Bitta Karate was one of the top JKLF gun wielders who had crossed over to Pakistan Administered Jammu and Kashmir in 1989, and received training and indoctrination in the camps there. In the interview, the journalist asks him on whose behest did he carry out the killing of the Pandits. He replied that he obeyed the orders of his senior Ashfaq Wani and Amanullah Khan. When asked if his senior told him to kill his parents would he do that as well,  he emphatically said, “Yes”. This speaks of the type of barbarianism that was sucking the Valley into its vortex. Asked how many Kashmiri Pandits he had gunned down, Bitta replied, “I lost the count after killing 22 of them”. When asked who was the first victim of his bullets he took the name of one Satish Kumar Tiku, who was a friend (and perhaps also a class fellow) of Bitta Karate, and occasionally visited him in his Srinagar home. Bitta Karate had returned after undergoing training in terrorist camps and Satish, not knowing where his friend Bitta had disappeared for a while, went to see him in his home. He found Bitta cleaning a gun (AK 47). Surprised on seeing the weapon Satish asked him what it was. Bitta avoided the question and said that it was a toy he played with. Naïve as Satish was, he took it lightly and soon forgot the incident and left his friend. But Bitta was greatly disturbed and went to see the ‘commander’, related to him the story and asked for directions. The commander told him to finish Satish lest he discloses it to police. Bitta went to Satish’s house and called him to come out of his home. No sooner did Satish step out on the street, Bitta, in a flash of a moment, aimed his China made pistol at him and fired shots that pierced through Satish’s heart. He fell down dead in a pool of blood. Brandishing his pistol in the air in broad day light, Bitta scared the pedestrians and walked away in complete confidence. Today the killer of 22+ Pandits is roaming as a freeman in Srinagar city.

Yasin Malik, Chief JKLF and killer of Air Force Officers

Yasin Malik, a terror comrade of Bitta was arrested in connection with the gunning down of six uniformed Indian Air Force personnel at Barzulla, Srinagar waiting at a bus stand. Yasin Malik riding the pillion of his friend’s bike opened fire at the standing airmen with an automatic weapon, killing all of them and the bike riders sped away. Yasin Malik, later on became the chief of JKLF in Indian Administered Jammu and Kashmir after the party split.

Ms. Girija Tickoo

Ms. Girija Tickoo, a Kashmiri Pandit teacher in a government school in Kupwara district was coming out of the school building after collecting her salary when she was accosted by gunmen who kidnapped her to some unknown place where she was gang raped. The assailants, fearing she might disclose their identity, forcibly put her under a machine saw and cut her body into pieces.

Avtar Krishan Koul, Deputy Director Food Supplies was gunned down by masked terrorists in his office. He had enquired into the disappearance of some truckloads of food grain supplies reportedly taken away by JKLF activists at gun point.

Lassa Kaul, Director Doordarshan (Television) Srinagar was gunned down outside his house in Bhan Mohalla. He was accused of relaying anti-militancy news. 

Pandit Premnath Bhat of Anantnag was a lawyer by profession and a very popular social figure much liked by people of all communities. Masked Jihadis barged into his house, dragged him out and emptied on him their magazines of their guns. 

Professor Nilakanth Raina (Lala) of Jammu and Kashmir Government Higher Education Department, an eminent historian and researcher was called by masked and armed gunmen at about dusk at his home in Fateh Kadal locality in Srinagar and gunned down at point blank range. Professor Nilakanth was conducting researches into the Buddhist antiquity of Jam’a Masjid mosque in Nowhatta, Srinagar.

In November 1989, Sheela Tikoo was gunned down near Habba Kadal.

On 4th of March, 1990, Mrs. M. N. Paul, the wife of an Inspector of BSF was kidnapped, raped and then murdered because she happened to be the wife of a government official.

Also in March 1990, B. K. Ganjoo, an engineer in Telecommunication Department was brutally gunned down while he tried to hide himself in an empty drum used for storing rice. The assailants climbed the third floor of his house to catch hold of him. His wife begged the murderers to kill her too but only to receive the sadist remark, “there should be someone left to cry over his dead body”.

In April 1990, a nurse named Sarla Bhat was kidnapped and continuously raped for several days before her dead body was thrown on the roadside.

Smt. Prana Ganjoo

Prof. K. L. Ganjoo 

In May 1990, Mrs. Prana Ganjoo and her husband Prof. K. L. Ganjoo were kidnapped in Sopore where the woman was raped and then both of them were murdered.

In June 1990, Mrs. J. L. Ganjoo, her husband and her sister-in-law (husband’s sister) were killed in their home in Ban Mohalla, Srinagar. 

In July 1990, a working woman, namely Teja Dhar was shot dead on the roadside in Ali Kadal, Srinagar.

In July 1990, a Pandit lady named Nanaji was gunned down on the roadside in Batamaloo, Srinagar.

In July 1990, Dr. Shani was locked up in her house in Karan Nagar and then the house was set on fire. Flames consumed her alive.

In August 1990, Babli Raina was raped in front of her family members in her house and then shot dead.

Sarwanand Koul Premi

One particular case which literally butchered the tradition of tolerance and communal harmony as well as the tradition of humanism in the Valley of Kashmir happened on 30th of April 1990, when four armed persons forced entry into the house of Sarwanand Koul Premi in Anantnag district. They dragged him out of his house along with Virender Koul, his 27-year old son for ‘enquiry’ and in the nearby jungle, the father and son both were gunned down. Sarwanand Koul, a poet and scholar, was 64 years of age and had translated the Bhagwat Gita into Kashmiri. A copy of the Quran was preserved in his house which he used to read occasionally.

It is not possible to give details of all Pandit killings in this Study paper. Panun Kashmir, a political organization of the displaced Pandits, has published a complete list of about 1341 Kashmiri Pandits who were killed by Jihadi armed men in the course of armed insurgency in the Valley of Kashmir in 1990 and after. This includes the disappeared and fished out Pandits, whose identity was not established and the police kept no record of them. Interestingly the J&K State government reduced the number of Pandits killed by militants below 200. According to critics, this distortion of numbers has been done deliberately to escape the censure by the UN, which according to Tokyo Convention has recognized killings beyond 200 as genocide. It must be noted that the National Commission for Human Rights of India while considering the appeal of the Kashmiri Pandits, said that they were subjected to killings ‘akin to genocide’.

Apart from individual killings, Kashmiri Pandits were also subjected to horrific massacres as Jihadi insurgency fanned all over the Kashmir Valley and its adjoining areas. Here is appended, a chart that gives some information about mass killings of the Kashmiri Pandits and (other) Hindus in post-exodus days.

Event             Date               Death toll

Wandhama   25/01/1998    23 Hindus massacre

Prankote         17/04/1998   26 Hindus massacre

Chapnari        19/06/1998    25 Hindus  massacre

Amarnath       01/08/2000   30 Hindus  pilgrimage                                           massacre
Kishtwar        03/08/2001     19 Hondus massacre

As disorder and lawlessness gripped the Valley, the Pandits shivered with fear. This was the atmosphere of fear and lawlessness in which the Pandits became homeless. In these circumstances it was but natural that the entire Pandit community stood fear-stricken and then followed the impulse of running away from this cauldron. The entire community had lost the confidence in the majority community.

Members of a high ranking delegation of parliamentarians visiting Srinagar to assess the ground situation quarrelled among themselves on seating arrangements in the meeting room.  They showed scant understanding and interest in the critical situation in the Valley and the sword of death dangling on the head of the vulnerable minority. The Pandits found that the Indian government, too, had written them off. Threatened and defenceless Pandits had no option but to leave their millennia old homeland, homes, hearths, properties, jobs, business, farms, orchards, temples, shrines, cremation grounds, Gods, deities, and the ashes of their forefathers. They engaged whatever means of transportation they could manage, took a bagful of clothing and headed out of the Valley to unknown and un-seen destinations. They left in trickles for fear of being captured en route and butchered in cold blood. The process continued for the first two-three months of 1990. Despite the fact that thousands of soldiers were garrisoned in Badami Bagh Cantonment, Srinagar, not one soldier escorted the fleeing fugitives. In spite of the silence of the Kashmiri Muslims on the atrocities committed against the Kashmiri Pandits, the general masses of Kashmiri Muslims did not obstruct the exit of the Kashmiri Pandits and facilitated their safe journey out of the Kashmir Valley.

The Pandits of Kashmir, who had braved numerous spells of forced conversions and destruction of their civilizational symbols during six centuries in the past, were extirpated from their five thousand year-old homeland at a time when India was governed by a Democratic and Secular dispensation. Seeing the current rise in Islamic fundamentalism and radicalization of the youth of the Valley of Kashmir, it can be concluded that the Kashmir Valley’s ethnic cleansing is complete and everlasting. They have been banished from their birth place not for decades or centuries or millennia, but for all times to come.

Aftermath

After their departure the houses of the Kashmiri Pandits remained abandoned in the Kashmir Valley. Miscreants looted household goods, furniture, kitchenware, accessories, electronic gadgets, small libraries, papers, files and documents. Electricity and sanitary fittings were pulled out, taken away and sold. In most cases even the doors and windows of these houses were removed and stolen.   

bTheare structures were set on fire if these did not happen to be in densely populated areas. Large number of houses and properties went on distress sale. Shops were grabbed by the locals, though a handful of them fetched the owner some money. In villages, the ruins of torched Pandit’s houses were grabbed and showed as Muslim Endowment (Awqaf) property in revenue records. If any Pandit was able to sell his property somehow, he had to remain content with its throw-away price. Landed properties of Pandit shrines, temples and crematoriums stand largely vandalized and usurped. The ethnic cleansing of the Valley of Kashmir was completed.


Conclusion

The Kashmir Valley has become a theocratic Islamic place within the secular Indian Union. The people of the Kashmir Valley, with hundred per cent Muslim population (barring a few negligible minorities which account for less than 1%), are increasingly identifying themselves with the wider Sunni Muslim world. The Kashmir Valley does not have a viable economy and it depends on huge financial doles from New Delhi under one or the other pretext. However, the State Government is usually unwilling to render any account for these receipts which results in no accountability and leads to corruption. Many members of the political leadership of the Kashmir Valley, including the Kashmiri separatists are mostly ambivalent and their pro-Indian or pro-Pakistani credentials are subject to the quantum of funds provided.

The return of the Kashmiri Pandits to the Kashmir Valley depends on the goodwill of the majority community in the Valley. That is no more to be found nor is there wisdom enough within the leadership of the Kashmir Valley to understand how important it is to live in harmony with people of other faiths. The Kashmiri Pandits should understand that the fetters they wore for seven centuries are broken once and for all and their wings should take them over to new climes and lands.

Diasporas have, also, built great civilizations.

July 2017. © European Foundation for South Asian Studies (EFSAS), Amsterda.

The European Foundation for South Asian Studies

Muslim Mob Mentality

By Rajeev Mishra

1996 की बात है, तब मैं भी लगभग सेक्युलर हुआ करता था. लगभग, मतलब अयोध्या में सुलभ शौचालय बनवा दो की बकचोदी से निकला था और सभी मुसलमान बुरे नहीं होते की खुशफहमी में अटका था ।

राँची में उन दिनों मेन रोड पर ईद के दस दिन पहले से सड़क को घेर कर बाजार लगा दिया जाता था । सारी गाड़ियाँ चर्च रोड पर डाइवर्ट हो जाती थीं, बाजार के बीच से पैदल चलना भी मुश्किल था ।

ऐसे ही एक दिन मैं उस बाजार से गुज़र रहा था. मैंने महसूस किया किसी का हाथ मेरी पिछली जेब में था. मैंने हाथ पकड़ लिया. घूम कर देखा तो एक 6-7 साल का बच्चा मेरी जेब में हाथ डाले था. उसके कंधे पर 4-5 बेल्टें लटकी थीं और वह बेल्ट बेचने की एक्टिंग कर रहा था ।

इसके पहले कि मैं उससे कुछ पूछ पाता, वह जोर जोर से चिल्लाने लगा – हाथ छोड़, मेरा हाथ छोड़…

देखते देखते 10 सेकंड के अंदर 25-30 लोगों ने मुझे घेर लिया. सब जोर जोर से चिल्लाने लगे । मैंने उनको बताने की कोशिश की कि वह बच्चा पॉकेटमारी कर रहा था, पर उन्हें क्या मालूम नहीं था? उन्हीं की निगरानी में तो वह ट्रेनिंग ले रहा था ।

स्थिति बिगड़ने के पहले मैंने उसका हाथ छोड़ दिया. मेरे सामने वह छह साल का पिद्दी सा बच्चा अब बुलंद होकर गंदी गंदी गालियाँ दे रहा था । और मेरे सामने वहाँ से जल्दी से जल्दी भागने के अलावा और कोई उपाय नहीं था ।

फंसे हैं आप भी कभी ऐसी जिहादी भीड़ में । कभी खुद को असहाय महसूस किया है अपने ही देश में?

तो आप अकेले नहीं हैं । शेयर कीजिये अपनी कहानी #MuslimMobMentality हैशटैग से । आगाह कीजिये दूसरों को भी और याद रखिये, आपमें और डाॅ नारंग में बस इतना सा फासला है…

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