सन सैंतालिस में बंटवारा क्यों हुआ इसकी खोजबीन भारत में न के बराबर हुई है, हुई भी है तो राजनीतिक कारणों को जानने से आगे जाने की कोशिश नहीं की गयी है। लेकिन भारत के उलट पाकिस्तान में इस बात पर खूब बहस हुई है कि पाकिस्तान क्यों बनाया गया। बहुत सारे तर्क है, तथ्य हैं जिनमें एक तर्क है व्यापार। एक बुद्धिजीवी वर्ग ऐसा भी है जो यह मानता है कि बंटवारे के मूल में मुस्लिम व्यवसाइयों के हित थे जिन्हें डर था कि अगर आजादी आई तो हिन्दुओं के बीच व्यापार करना मुश्किल हो जाएगा।


मोहम्मद इकबाल ने अलग देश नहीं मांगा था। इलाहाबद के मुस्लिम लीग के जलसे में उन्होंने जो मांग रखी थी वह अलग राज्य की मांग थी। पहली बार इकबाल ने भारत के पश्चिमी हिस्से को चिन्हित किया था जो आगे चलकर पाकिस्तान बना। वे अलग राज्य चाहते थे जहां हिन्दुओं का दखल न हो। लेकिन अल्लामा इकबाल की मौत के बाद जिन्ना उसके आगे गये। उन्होंने अलग देश मांगा। इस अलग देश को पहला आर्थिक समर्थन दिया अवध के राजा महबूबाबाद ने। राजा महबूबाबाद मोहम्मद आमिर अहमद खान जिन्ना के मित्र भी थे और मुस्लिम लीग के नेता भी। जिन्ना को अलग पाकिस्तान के लिए शुरुआती फंडिंग उन्होंने ही की लेकिन फिर बाद में पंजाब के मुस्लिम कारोबारियों ने यह काम अपने हाथ में ले लिया।


पंजाब के मुस्लिम कारोबारी यह मानते थे कि आजादी आई तो हिन्दुओं के साथ व्यापार में बराबरी नहीं कर पायेंगे। उनका ऐसा सोचने के पीछे कारण था। पंजाब के सबसे बड़े शहर लाहौर में हिन्दू अल्पसंख्यक थे लेकिन उनका कारोबारी निजाम मुसलमानों से बड़ा था। लाहौर और कराची का कारोबार कमोबेश गैर मुस्लिमों के हाथ में था। मुस्लिम कारोबारी भी उस हिस्से में पनप रहे थे जहां हिन्दुओं या सिखों की आबादी ज्यादा थी। इन्हीं लोगों में एक बड़ा कारोबारी नाम मलिक गुलाम मोहम्मद का था। मलिक गुलाम मोहम्मद पंजाब के महिन्द्रा बंधुओं के साथ महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा की स्थापना कर चुके थे लेकिन उन्हें भी लगता था कारोबार के मामले में वे हिन्दुओं की बराबरी नहीं कर सकते। इसलिए पाकिस्तान बनने के बाद वे भी पाकिस्तान चले गये और पाकिस्तान के पहले वित्त मंत्री बने। वित्तमंत्री के रूप में उन्होंने पाकिस्तान के लिए इस्लामिक अर्थव्यवस्था का प्रारूप सामने रखा।


लेकिन आज सात दशक का इतिहास उठाकर देखें तो समझ आता है कि पाकिस्तान जिस व्यापारिक हित के नाम पर इस्लाम का लिबास पहनकर अस्तित्व में आया उसे ही हासिल नहीं कर पाया। आज भी पाकिस्तान में वह इस्लामिक अर्थव्यवस्था तो लागू नहीं हो पाई जिसका ख्वाब मलिक मोहम्मद ने देखा था लेकिन उस ख्वाब ने पाकिस्तान को मटियामेट करके रख दिया। भ्रष्टाचार से निपटने के लिए जिस इस्लामिक अर्थव्यवस्था का स्वरूप सामने रखा गया वही भ्रष्टाचार इस्लामिक अर्थव्यवस्था को खा गया। आज पाकिस्तान इस बात का रोना रोता है कि उसके यहां कोई विदेशी निवेश नहीं आ रहा है। चीन के रणनीतिक निवेश को छोड़ दें तो पाकिस्तान अपने ही मुल्क में पराया हो गया है। वह शरीफ परिवार जो अमृतसर में बड़ा कारोबारी परिवार होता था और आज भी पाकिस्तान का सबसे बड़ा कारोबारी परिवार है, वह भी सीएम और पीएम बनने के बाद भी हालात को संभाल नहीं पाया।


जिसका नतीजा यह है कि आज पाकिस्तान हिन्दुस्तान के चार अरब डॉलर मूल्य के सामानों की अवैध मंडी बनकर रह गया है। पाकिस्तान के नाम पर जिस व्यापारिक हित को बचाना था उस हित को चोरी छिपे उसी हिन्दुस्तान के हाथों गिरवी रख दिया गया, जिनसे अलग हुए थे। सीधे तौर पर पाकिस्तान को हमेशा दुश्मन राज्य का दर्जा ही देकर रखा लेकिन अंदर खाने अपनी जरूरतें भी पूरी करता रहता है। भारत के रिलायंस और जिन्दल आज भी चोरी छिपे शरीफ खानदान की मदद करते हैं। भारत के इंजीनियर पाकिस्तान नहीं जा सकते क्योंकि वे हिन्दू इंजीनियर हैं लेकिन शरीफ परिवार को गन्ने की खोई से बिजली बनाने का कारखाना लगाना हुआ तो उन्होंने चोरी छिपे भारत से इंजीनियर बुलाये। वहां के कारोबारी बाघा बार्डर से माल नहीं मंगा सकते इसलिए वाया दुबई मंगाते हैं। इसी तरह पाकिस्तान में यह चर्चा आम है कि यहां के बासमती उत्पादक वाया दुबई भारत को चावल निर्यात करते हैं फिर उस पर किसी भारतीय कंपनी का ब्रांड चिपकाकर दुनिया में बेचा जाता है क्योंकि पाकिस्तान का ब्रांड दुनिया में बिकता नहीं।


जबकि पाकिस्तान के उलट और तमाम तरह की मजहबी झंझटों के बाद भी मुसलमानों ने अपना आर्थिक विकास किया है। केरल, गुजरात और महाराष्ट्र इसमें सबसे आगे हैं। भारत में मुस्लिम बड़े कारोबारियों की लिस्ट में शामिल हैं। भारत के पचास सबसे धनी लोगों में तीन मुस्लिम हैं और उनकी माली हैसियत इतनी है जितनी पाकिस्तान के सभी बड़े कारोबारियों की मिलाकर नहीं होगी। त्रिशूर के एमए युसुफ अली, सिपला के मालिक ख्वाजा हामिद, विप्रो के मालिक अजीम प्रेमजी, स्टार इन्श्योरेन्स के मालिक बीएस अब्दुल रहमान कुछ चंद नाम है जिनकी हैसियत शायद पाकिस्तान के कुल बजट के बराबर होगी।


फिर सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान बनाकर मुसलमानों ने हासिल क्या किया? अगर कारोबार और विकास के लिए ही पाकिस्तान चाहिए था तो आज पाकिस्तान को हर लिहाज से भारत से आगे होना चाहिए था। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत जरूरतों के मसले पर भी बड़ी आबादी के बाद भारत पाकिस्तान से बहुत आगे निकल चुका है। अगर लाहौर में हिन्दू कारोबारियों ने ही मुस्लिम कारोबारियों को दबा रखा था तो बंटवारे के बाद लाहौर को दिल्ली से दस गुना आगे होना चाहिए था। लेकिन वह दिल्ली से भी दस गुना पीछे क्यों चला गया? जो पाकिस्तान आर्थिक ताकत होने के लिए हिन्दुओं से अलग हुआ था उसके हर नागरिक पर सवा लाख का कर्ज क्यों लद गया है? वह पाकिस्तान जो आर्थिक समृद्धि के लिए अस्तित्व में आया था वह दिवालियेपन के कगार पर क्यों खड़ा हो गया है?


इन सवालों के जवाब पाकिस्तान में एक बहुत छोटा वर्ग ही सही लेकिन तलाश रहा है। उनके सामने सवाल है कि रेलवे का वही ढांचा लेकर हिन्दू बुलेट ट्रेन के दरवाजे तक पहुंच गये जबकि पाकिस्तान आज भी चीन के कबाड़ इंजनों और साठ के दशक की बोगियों में सफर क्यों कर रहा है? अगर बंटवारे के बाद के हालात का जायजा लेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने मजहब और इस्लामिक विकास के नाम पर एक जमीन हासिल की और उसे आतंक और नफरत से भर दिया।