By Rajeev Mishra

1996 की बात है, तब मैं भी लगभग सेक्युलर हुआ करता था. लगभग, मतलब अयोध्या में सुलभ शौचालय बनवा दो की बकचोदी से निकला था और सभी मुसलमान बुरे नहीं होते की खुशफहमी में अटका था ।

राँची में उन दिनों मेन रोड पर ईद के दस दिन पहले से सड़क को घेर कर बाजार लगा दिया जाता था । सारी गाड़ियाँ चर्च रोड पर डाइवर्ट हो जाती थीं, बाजार के बीच से पैदल चलना भी मुश्किल था ।

ऐसे ही एक दिन मैं उस बाजार से गुज़र रहा था. मैंने महसूस किया किसी का हाथ मेरी पिछली जेब में था. मैंने हाथ पकड़ लिया. घूम कर देखा तो एक 6-7 साल का बच्चा मेरी जेब में हाथ डाले था. उसके कंधे पर 4-5 बेल्टें लटकी थीं और वह बेल्ट बेचने की एक्टिंग कर रहा था ।

इसके पहले कि मैं उससे कुछ पूछ पाता, वह जोर जोर से चिल्लाने लगा – हाथ छोड़, मेरा हाथ छोड़…

देखते देखते 10 सेकंड के अंदर 25-30 लोगों ने मुझे घेर लिया. सब जोर जोर से चिल्लाने लगे । मैंने उनको बताने की कोशिश की कि वह बच्चा पॉकेटमारी कर रहा था, पर उन्हें क्या मालूम नहीं था? उन्हीं की निगरानी में तो वह ट्रेनिंग ले रहा था ।

स्थिति बिगड़ने के पहले मैंने उसका हाथ छोड़ दिया. मेरे सामने वह छह साल का पिद्दी सा बच्चा अब बुलंद होकर गंदी गंदी गालियाँ दे रहा था । और मेरे सामने वहाँ से जल्दी से जल्दी भागने के अलावा और कोई उपाय नहीं था ।

फंसे हैं आप भी कभी ऐसी जिहादी भीड़ में । कभी खुद को असहाय महसूस किया है अपने ही देश में?

तो आप अकेले नहीं हैं । शेयर कीजिये अपनी कहानी #MuslimMobMentality हैशटैग से । आगाह कीजिये दूसरों को भी और याद रखिये, आपमें और डाॅ नारंग में बस इतना सा फासला है…

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